शीतकालीन सत्र में हिंदूवादी शिवसेना नागरिकता संशोधन बिल पर क्या रुख अख़्तियार करेगी ?

बेंगलुरु। महाराष्‍ट्र सरकार के गठन को लेकर शिवसेना और एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के बीच माथापच्ची जारी है। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लेकर शिवसेना-बीजेपी गठबंधन भले टूट गया है, लेकिन क्‍या उसकी गहराई भी खत्‍म हो गई है? तीन दशकों से एक विचाराधारा पर भाजपा के साथ चलने वाली शिवसेना महाराष्‍ट्र में सत्ता के लालच में विरोधियों के साथ जा बैठी हैं। ऐसे में आज से शुरु हुए शीतकालीन सत्र में शिवसेना को पहली बार हिदुत्‍व मुद्दे पर कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। उसकी यह पहली अग्नि परीक्षा नागरिकता संसोधन बिल पर होगी। वहीं इस बिल को लेकर केन्‍द्र सरकार की स्थिति भी करो या मरो वाली है।

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बता दें सोमवार से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा हैं। इस बार लोकसभा में पास करने के लिए 22 बिलों की सूची तैयार की गई है। इस शीतकालील सत्र में सरकार नागरिकता संशोधन बिल भी पेश करने जा रही है। शीतकालीन सत्र में सरकार की ओर से इस विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा। इससे पहले केंद्र सरकार ने 5 अगस्त को संसद में आर्टिकल 370 और 35A को हटाने का ऐलान किया था। इसके बाद 31 अगस्त को असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस की अंतिम सूची भी जारी कर दी गई थी। अब बीजेपी ने अपने इस कोर अजेंडे पर भी आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं।

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क्या हैं यह बिल

नागरिक संशोधन विधेयक के तहत 1955 के सिटिजनशिप ऐक्ट में बदलाव का प्रस्ताव है। इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर भारत में बसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रस्ताव है। इन समुदायों के उन लोगों को नागरिकता दी जाएगी, जो बीते एक साल से लेकर 6 साल तक में भारत आकर बसे हैं। फिलहाल भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए यह अवधि 11 साल की है।

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दोनों ही परिस्थितियों में शिवसेना की होगी फजीहत

देखा जाये तो उद्धव ठाकरे एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन में नैसर्गिक रूप से मिसफिट हैं। दोनों ही दो ध्रुवों की राजनीति करते हैं। उद्धव ठाकरे के पास अपनी बात समझाने के लिए उदाहरण भी कम पड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि इस विधेयक के चलते संसद में विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के बीच घमासान भी देखने को मिल सकता है।

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इस बिल का एनसीपी और कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल लंबे समय से विरोध करते आ रहे हैं। वहीं पूर्व में एनडीए में शामिल शिवसेना इसकी पक्षधर रही है। महाराष्‍ट्र में एनडीए का साथ छोड़कर एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली शिवसेना के लिए इस बिल को लेकर अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। नागरिक संसोधन बिल का विरोध या समर्थन, दोनों ही परिस्‍थिति शिवसेना के लिए असहज होगी।

भाजपा के लिए करो या मरो वाली स्थिति

भाजपा के लिए करो या मरो वाली स्थिति

इस बिल को लेकर केन्‍द्र सरकार की स्थिति करो या मरो वाली हो गई है। क्योंकि असम में एनआरसी लागू होने के बाद लाखों की संख्या में हिंदू राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में नाम दर्ज कराने से चूक गए हैं। इनकी नागरिकता बचाने के लिए सरकार के पास नागरिकता संशोधन बिल को कानूनी रुप देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। सरकार को असम की तर्ज पर दूसरे राज्यों में भी चरणबद्ध तरीके से एनआरसी लागू कराना है। पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि वह असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस लागू होने से पहले इसे लाना चाहते हैं। इससे एनआरसी में जगह न पाने वाले गैर-मुस्लिमों को राहत मिल सकेगी और उन्हें भारत का ही नागरिक माना जाएगा।

बिल पास करवाने में कोई मुश्किल नहीं होगी

बिल पास करवाने में कोई मुश्किल नहीं होगी


गौरतलब है कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2019 के पहले बीजेपी सरकार ने पिछले कार्यकाल में यह विधेयक पेश किया था, लेकिन विरोधियों के कड़े विरोध के कारण यह बिल अधर में लटक गया। विपक्षी दलों ने विधेयक को धार्मिक आधार पर भेदभावपूर्ण बताया था। पिछली लोकसभा के भंग होने के बाद विधेयक निष्प्रभावी हो गया था इसलिए इसे अब नए सिरे से पेश किया जाएगा। लेकिन माना जा रहा है कि भाजपा के लिए यह बिल पास कराने में कोई मुश्किल नहीं होगी। शिवसेना समेत अन्‍य सहयोगियों की नाराजगी के बावजूद भाजपा राज्यसभा में संख्‍या बल के हिसाब से बहुमत के करीब हैं।

भाजपा अपना सकती है यह रणनीति

भाजपा अपना सकती है यह रणनीति

एनडीए से गठबंधन टूटने के बाद तीन सांसदों वाली शिवसेना दूर हो गई हैं वहीं , जदयू के (6), और असम गण परिषद समेत पूर्वोत्‍तर के कुछ दल इसके विरोध में हैं। इसके बावजूद 238 सदस्‍यीय उच्‍च सदन में भाजपा के मनोनीत और निर्दलीय सांसदों के बिल के समर्थन में कुल 113 सांसदों का समर्थन मिल जाएगा। बिल को पास करने में सात मतों की कमी को पूरा करने के लिए पार्टी बीजद (7), टीआरएस (6), वाईएसआर कांग्रेस (2) को साधने, जदयू को तीन तलाक बिल की तरह वाकआउट के लिए मनाने जैसे कई विकल्प हैं। ऐसे में इस बिल को अब तक पारित कराने में नाकाम रही भाजपा इस बार बेहतर स्थिति में है।

विपक्ष इसलिए करता रहा है विरोध

विपक्ष इसलिए करता रहा है विरोध

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस बिल का लगातार विरोध करते आए हैं। सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले विपक्ष का मानना है कि यह विधेयक संविधान का उल्लंघन करता है। विपक्ष का कहना है कि यह संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है, जो धार्मिक समानता की बात करता है।

पूर्वोत्‍तर के लोग इसलिए कर रहे विरोध

पूर्वोत्‍तर के लोग इसलिए कर रहे विरोध

पूर्वोत्तर क्षेत्र में कुछ वर्ग का कहना है कि अगर नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू किया जाता है तो पूर्वोत्तर के मूल लोगों के सामने पहचान और आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा। हालांकि असम में भाजपा के वरिष्‍ठ नेता हेमंत बिस्व सरमा ने असम और पूर्वोत्तर के लोगों की चिंताओं को लेकर कहा है कि इसके ड्राफ्ट में बदलाव किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इस विधेयक में कुछ बदलाव किए जाएंगे ताकि पूर्वोत्तर के मूल लोगों की पहचान को सुरक्षित रखा जा सके। उन्‍होंने यह भी कहा कि नागरिकता संशोधन विधेयक असम में लगभग चार से पांच लाख लोगों के लिए समस्याएं पैदा करेगा लेकिन यह राज्य में चहुंमुखी विकास सुनिश्चित करेगा।

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