Sadiq Ali केस क्या है ? शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का दिया जा रहा है हवाला
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानने का चुनाव आयोग का फैसला सादिक अली केस में सुप्रीम कोर्ट निर्णय के अनुसार है। कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इसे न्यायसंगत फैसला बताया है।

शिवसेना का नाम और चुनाव निशान महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे गुट को मिलने पर उद्धव ठाकरे और टीम भड़की हुई है। सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। दावा किया गया है कि चुनाव आयोग ने उनके साथ अन्याय किया है। ठाकरे गुट के नेता संजय राउत ने तो इसके पीछे दो हजार करोड़ रुपए की डील तक का भी 'शिगूफा' छोड़ दिया है। लेकिन, बात तथ्यों की करें तो इस विवाद की शुरुआत से ही सादिक अली केस में आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का खूब जिक्र हो रहा है। चुनाव आयोग के कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी कहा है कि शिंदे गुट के हक में फैसला लेते हुए शायद आयोग ने उसी फैसले को ध्यान में रखा है। आइए जानते हैं कि सादिक अली केस है क्या ?

सादिक अली केस के अनुसार है आदेश- पूर्व सीईसी
शिवसेना पार्टी विवाद में चुनाव आयोग ने हाल में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में जो फैसला दिया है, उसका कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों (CEC) ने भी समर्थन किया है। चुनाव आयोग ने शिवसेना नाम और धनुष और तीर के निशान पर शिंदे गुट का हक बताया है। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसले को स्थापित नियमों और अदालती फैसलों के अनुरूप बताया है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा है कि ऐसा लगता है कि आयोग ने सभी उपलब्ध साक्ष्यों को देखने के बाद विधायी बहुमत के आधार पर निर्णय किया है, जो कि ऐतिहासिक सादिक अली फैसले के अनुसार है।

सादिक अली केस क्या है ?
1972 के सादिक अली और अन्य बनाम भारतीय चुनाव आयोग के मामले में यह माना गया कि एक पार्टी के विभिन्न गुटों के विवाद में सदस्यों के बहुमत (संगठनात्मक और विधायी विंग) का समर्थन विवाद को तय करने के लिए महत्वपूर्ण परीक्षण है। उसमें चुनाव आयोग ने पाया था कि कांग्रेस के इंदिरा गांधी वाले गुट के पास विधायी और संगठनात्मक दोनों आधार पर बहुमत है। और 11 जनवरी, 1971 के आदेश में इसे ही इंडियन नेशन कांग्रेस के रूप में मान्यता दी थी। इसके खिलाफ दूसरा गुट सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। उसने फैसला दिया कि बहुमत के लिए चुनाव आयोग द्वारा अपनाया गया तरीका उचित और व्यवहार्य है और इसका सही से पालन किया गया है।

'अयोग्यता और चुनाव निशान का मसला अलग-अलग'
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के मुताबिक,'सादिक अली आदेश सिर्फ विधायी बहुमत के बारे में नहीं है। ये सभी व्यवहार्य परीक्षणों पर विचार करने और आखिरकार उन परीक्षणों को छोड़ देने के बारे में था जो अव्यवहार्य पाए गए थे।' 'अगर विधायी और संगठनात्मक दोनों समर्थन अनिर्णायक पाया जाता है तो भारतीय चुनाव आयोग चुनाव निशान को फ्रीज कर सकता है और दोनों गुटों से नया चुनाव चिन्ह तलाशने के लिए कह सकता है।' रावत का कहना है कि पार्टी सदस्यों का दल-बदल के चलते अयोग्यता का मुद्दा और पार्टी के चुनाव चिन्ह का विवाद दोनों अलग-अलग चीजें हैं। दअरसल, उद्धव ठाकरे गुट ने तर्क दिया था कि पहले सुप्रीम कोर्ट को अयोग्यता के मसले पर फैसला करने देना चाहिए और फिर पार्टी निशान पर फैसला किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान की 10वीं सूची के अनुसार सुप्रीम कोर्ट अयोग्यता पर फैसला कर सकता है। लेकिन, 'पार्टी निशान का विवाद एक भिन्न मसला है और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह दोनों अलग प्रक्रियाएं हैं और किसी एक के लंबित होने के चलते दूसरे को नहीं रोके रखा जा सकता है।'

चुनाव आयोग का आदेश न्यायसंगत है- पूर्व सीईसी
वहीं पूर्व सीईसी सुनील अरोड़ा ने शिवसेना पर चुनाव आयोग के फैसले को 'न्यायसंगत' बताया है। उन्होंने कहा, 'हालांकि, मैंने चुनाव आयोग का पूरा आदेश नहीं देखा है, लेकिन इसके बारे में काफी रिपोर्ट देखी है। यह बहुत साफ है कि चुनाव आयोग ने सादिक अली मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन किया है, जो दशकों से एक कसौटी बनी हुई है। इस मामले में यह एक न्यायसंगत आदेश है।'
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'अक्सर विधायी बहुमत ही आखिरी परीक्षण होता है'
एक और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा है कि पार्टी के चुनाव चिन्ह विवाद में चुनाव आयोग ने हमेशा से सादिक अली मामले में आए आदेश का पालन किया है और सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा कहा है कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग के पास ही निर्णय करने का अधिकार है। एक और पूर्व सीईसी ने वैसे चुनाव आयोग के मौजूदा फैसले से अच्छी तरह से वाकिफ होने से इनकार किया है, लेकिन कहा है कि सादिक अली केस का फैसला सबको पता है और कई मामलों में इसका प्रभाव रहा है। वो बोले कि 'यह कोई पहला ऐसा केस नहीं है।' उन्होंने कहा, 'अक्सर विधायी बहुमत ही आखिरी परीक्षण होता है, क्योंकि संगठनात्मक बहुमत कई मामलों में धूमिल भी हो सकता है.....'












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