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Bangladesh Crisis News: बांग्लादेश से शेख हसीना की विदाई पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए क्यों बनी चुनौती?

Bangladesh Security Challenges for Northeast India: बांग्लादेश में जिस तरह से शेख हसीना का तख्तापलट हुआ है और उसमें धीरे-धीरे जिन शक्तियों का हाथ सामने आ रहा है, वह पूर्वोत्तर भारत के लिए नई सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकते हैं। वहां अंतरिम सरकार चलाने की जिम्मेदारी भले ही नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस को मिली है, लेकिन सत्ता की डोर कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के हाथों में ही रहने वाली है।

इतिहास गवाह है कि जब बीएनपी की बेगम खालिदा जिया का जमाना था तो पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठनों के लिए बांग्लादेश पनाहगार बना हुआ था। शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शन में जमात की युवा इकाई छात्र शिविर का रोल सामने आ रहा है और जमात का जिया की पार्टी के साथ कुछ अलग ही तालमेल रहा है।

northeast india

जमात-बीएनपी के कार्यकाल में बांग्लादेश रहा भारत-विरोधी गतिविधियों का अड्डा
बांग्लादेश में भड़की मौजूदा हिंसा में जिस तरह से शेख हसीना और उनकी आवामी लीग के साथ-साथ भारतीय भावनाओं को कुचलने की कोशिश हो रही है, उससे जमात और खालिदा जिया की पार्टी के मंसूबे जाहिर हो रहे हैं। शेख हसीना के कार्यकाल से पहले जब बांग्लादेश की सत्ता जमात समर्थित बीएनपी के हाथों में थी, तब भारत-विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने में इस देश ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

जमात पर नकेल कसती रहीं शेख हसीना
सोमवार को बांग्लादेश के राष्ट्रपति की ओर से अंतरिम सरकार के गठन के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में जमात के नेता भी मौजूद थे। इससे तय है कि देश में कट्टरपंथी ताकतों का दबदबा बढ़ गया है। शेख हसीना इसपर न सिर्फ पाबंदी लगा चुकी थीं, बल्कि इसके साथ आतंकी संगठन की तरह बर्ताव करने की हिदायत तक दे रखी थी।

शेख हसीना ने जमात के चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाई थी। उनके कार्यकाल में ही मतिउर रहमान निजामी समेत जमात के एक कई बड़े नेताओं को 1971 के युद्ध अपराध के लिए मौत की सजा दी गई थी।

जमात का सरगना पूर्वोत्तर के उग्रवादियों को करता था हथियारों की सप्लाई
निजामी जमात का वही सरगना था, जिसे 2004 में पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादियों और आतंकी संगठनों की मदद के लिए 10 ट्रक हथियार तस्करी का दोषी पाया गया था। जमात का चरित्र शुरू से आतंकवादियों की मददगार का रहा है, जिसमें बांग्लादेश की धरती पर सक्रिय लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी भी शामिल हैं।

शेख हसीना की सरकार बनते ही उग्रवादियों के लिए शुरू हुए थे बुरे दिन
इसकी गतिविधियां तब बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं, जब 2001 से 2006 के बीच खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी का शासन था। इस दौरान पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठन बांग्लादेश की धरती से अपनी गतिविधियां चला रहे थे। जब, शेख हसीना सत्ता में लौटीं तो उन्होंने इन उग्रवादियों को भारत के हवाले कर दिया था।

पूर्वोत्तर भारत से बांग्लादेश की 1,879 किलोमीटर लंबी सीमा लगी हुई है। खासकर शेख हसीना सरकार से पहले के दौर में यह सीमा उग्रवादी घटनाओं के लिए तनाव की वजह रह चुकी है। हसीना के कार्यकाल में उग्रवाद के नजरिए से भारतीय हित का काफी भला हुआ है। वह पिछली बार 6 जनवरी, 2009 को सत्ता में आई थीं और उसके बाद से भारत के उत्तर-पूर्व के राज्यों में हालात बदलने में काफी सहायता मिलनी शुरू हुई।

जमात के जमते ही उग्रवादियों का लॉन्च पैड बन सकता है बांग्लादेश!
जबकि, बीएनपी-जमात के शासनकाल में बांग्लादेश ने असम, त्रिपुरा और नागालैंड समेत पूरे पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों को अपने यहां फलने-फूलने का मौका दिया। उनकी नेटवर्किंग में सहायता की, हथियार जुटाने में मदद की और यहां तक कि ट्रेनिंग और प्लानिंग का भी पूरा आधार तैयार करके दिया। एक तरह से खालिदा जिया के शासनकाल में बांग्लादेश भारत में उग्रवादी घटनाओं का लॉन्च पैड बन चुका था।

जमात के आईएसआई से सीधे ताल्लुकातों की वजह से पाकिस्तान के लिए भी भारत में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करना आसान हो गया था। यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) के लिए तो बांग्लादेश उस समय किसी जन्नत से कम नहीं था। खासकर 2003 में जब भूटान ने अपनी जमीन से भारतीय उग्रवादी संगठनों को खदेड़ना शुरू किया तो उन्हें बांग्लादेश में सुरक्षित ठिकाना मिल गया।

पहले कार्यकाल से ही शेख हसीना ने दोस्ती का रखा ख्याल
इतिहास गवाह है कि 1990 के दशक में अपने पहले कार्यकाल की शुरुआत में ही शेख हसीना ने उल्फा के महासचिव अनूप चेतिया को गिरफ्तार करके भारत को यह संदेश दे दिया था कि भारत अपने पड़ोसी पर अब भरोसा कर सकता है।

वहीं, जब 2009 में वह दूसरी बार सत्ता में लौट कर आईं तो पूर्वोत्तर में सक्रिय जिन बड़े उग्रवादियों को पकड़ कर भारत को सौंपा उनमें उल्फा सरगना अरबिंद राजखोवा और ससाधर चौधरी भी शामिल थे। 2013 में भारत का बांग्लादेश के साथ प्रत्यर्पण संधि हुआ, जिसकी वजह से उग्रवादियों के जल्द सौंपे जाने का रास्ता साफ हुआ और इसी का परिणाम है कि 2015 में उल्फा सुप्रीमो चेतिया को भारत के हवाले किया जा सका।

उग्रवादियों को बांग्लादेश से भागकर म्यांमार को बनाना पड़ा ठिखाना
शेख हसीना सरकार के भारत के साथ ऐसे बर्ताव की वजह से ही कई उग्रवादी संगठन म्यांमार में ठिकाना तलाशने को मजबूर हो गए। लेकिन, बदले हालात में वह पूर्वोत्तर में भारत की परेशानी बढ़ने का कारण बन सकते हैं।

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