मोदी राज में उपेक्षित शाहनवाज ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कभी MLC भी बनेंगे
करीब सात साल के बाद सैयद शाहनवाज हुसैन फिर किसी सदन के सदस्य बने। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि विधान पार्षद बनेंगे। लेकिन बने। शाहनवाज हुसैन के जीवन में अक्सर ऐसा हुआ है। जिसकी उम्मीद न की, वही हुआ। वे दिल्ली पढ़ने गये थे। आम मुसलमानों की तरह भाजपा के बारे में उनकी भी राय अच्छी नहीं थी। दिल्ली में इत्तेफाक से उनकी मुलाकात भाजपा के बड़े नेता आरिफ बेग से हो गयी। मध्य प्रदेश के रहने वाले आरिफ बेग भाजपा के संस्थापक सदस्यों में एक थे। आरिफ बेग से मिलने के बाद उनकी भाजपा के बारे में राय बदल गयी। 1986 में शाहनवाज भाजपा में शामिल हो गये। भारतीय जनता युवा मोर्च से राजनीति शुरू की। जब फायरब्रांड नेता उमा भारती भारतीय जनता युवा मोर्चा की अध्यक्ष बनीं तो शाहनवाज को यही लगा कि अब उनकी राजनीतिक पारी खत्म होने वाली है। लेकिन हुआ उल्टा। राम मंदिर पर उग्र भाषण देने वाली उमा भारती ने शाहनवाज हुसैन को जर्रा से आफताब बना दिया। शाहनवाज हुसैन का सियासी सफर समंदर के ज्वार-भाटे की तरह है। कभी ऊपर तो कभी नीचे। लेकिन वे हर स्थिति में निश्चिल खड़े रहे।

भाजपा की राजनीति के लिए ताने भी सहे
शाहनवाज हुसैन जब पढ़ाई कर रहे थे तब वे भी यही सोचते थे कि भाजपा एक मुसलमान विरोधी पार्टी है। लेकिन जल्द ही उनकी राय बदल गयी। आरिफ बेग ने उनका नजरिया बदल दिया। सिंकदर बख्त और खुद की नजीर दी। 1986 में भाजपा कोई बड़ी पार्टी नहीं थी। शाहनवाज ने एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम किया। मंदिर-मस्जिद विवाद के दौर में किसी मुस्लिम के लिए भाजपा की राजनीति आसान न थी। शाहनवाज हुसैन को इसके लिए ताने सहने पड़े। बिहार में रहने वाले माता -पिता को जिल्लत उठानी पड़ी। जब शाहनवाज हुसैन अपने गांव (बिहार के सुपौल) जाते तो लोग ताना मारते कि देखो, मास्टर नासिर हुसैन का बेटा जा रहा है जो भाजपा में चला गया। गांव के लोग माता-पिता को भी चुभने वाली बातें कहते। फिर भी वे भाजपा मे जमे रहे। भाजपा के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा 1990 से 1994 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष थे। तब तक शाहनवाज हुसैन कई मुस्लिम नौजवानों को भाजपा से जोड़ दिया। संगठन में उनके काम की तारीफ होने लगी तो जेपी नड्डा ने उन्हें अपनी टीम में शामिल कर लिया। उनकी राजनीति ठीकठाक चल रही थी।
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जब लगा कि राजनीति खत्म होने वाली है
1994 में उमा भारती भारतीय जनता युवा मोर्चा की अध्यक्ष बनीं। उमा भारती की नाम सुन कर ही शाहनवाज का दिल बैठ गया। कहा जाता है कि उस समय उमा भारती के भाषणों से मुस्लिम समाज में एक खौफ सा छा जाता था। वे राम मंदिर पर बड़े जोशिले भाषण करती थीं। शाहनवाज को लगा कि अब उनकी राजनीति का खात्मा होने वाला है। एक मुसलमान कार्यकर्ता को शायद ही वे तवज्जो दें। लेकिन शाहनवाज का ये डर जल्द ही दूर हो गया। जब वे पहली बार उमा भारती से मिले तो वे उनकी सहजता और ओज से प्रभावित हो गये। उमा भारती ने शाहनवाज को खुल कर काम करने की आजादी दी। फिर तो वे उमा भारती के राखीबंद भाई हो गये। उमा भारती ने ही अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार शाहनवाज हुसैन के बारे में बताया था।

गम को छिपा के मुसकुराते रहे शाहनवाज
2014 के लोकसभा चुनाव में शाहनवाज हुसैन में भागलपुर सीट पर केवल आठ हजार वोटों से हार गये थे। मोदी लहर में उनकी ये हार काफी चौंकाने वाली थी। कहा जाता है भाजपा की आंतरिक गुटबाजी के कारण शाहनवाज हार गये थे। फिर भी वे भागलपुर में जमे रहे। लोगों के लिए काम करते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि 2019 में उन्हें फिर भागलपुर से मौका मिलेगा। लेकिन जब ये सीट जदयू को दे दी गयी तो शाहनवाज हुसैन को झटका लगा। एक दो दिनों तक वे सदमे में रहे। नाराजगी भी दिखायी। लेकिन सब कुछ मर्यादा के दायरे में रह कर किया। शाहनवाज भले चुप रहे लेकिन लोग यही कहने लगे कि वाजपेयी युग के शाहनवाज की अब मोदी-शाह के दौर में कोई जरूरत नहीं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर ये आरोप लगने लगा कि वे शाहनवाज हुसैन की अनदेखी कर रहे हैं। लेकिन शाहनवाज हुसैन ने अपनी उपेक्षा पर कभी कोई शिकायत नहीं की।

क्या नाराज थे नरेन्द्र मोदी ?
जब शाहनवाज हुसैन 2014 का लोकसभा चुनाव हार गये तो नरेन्द्र मोदी ने उन्हें राज्यसभा में क्यों नहीं भेजा ? कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी को शाहनवाज हुसैन से एक पुरानी खुन्नस थी। जब वाजपेयी सरकार में शाहनवाज हुसैन नागरिक उड्डयन मंत्री थे तब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को किसी काम से नागरिक उड्डयन मंत्री से मिलना था। मुलाकात के समय और स्थान तय हो गया। नरेन्द्र मौदी बैठे रह गये और शाहनवाज हुसैन नहीं आये। मुलाकात दिन के दस बजे तय थी। शाहनवाज बारह बजे के बाद वहां पहुंचे। कहा जाता है तब से नरेन्द्र मोदी ने इस बात की मन में गांठ बांध ली। एक इंटरव्यू में शाहनवाज हुसैन से उनकी तथाकथित इस लेटलतीफी पर सवाल पूछा गया था। तब शाहनवाज ने कहा था कि ये बेबुनियाद बात है। भारत सरकार का एक मंत्री मुख्यमंत्री का अनादर कैसे कर सकता है। ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। बहरहाल, शाहनवाज हुसैन की संसदीय राजनीति का वनवास खत्म हुआ। आखिरकार मोदी-शाह की टीम को बिहार में नयी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए शाहनवाज हुसैन की जरूरत महसूस हुई।












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