Shaheen Malik: अदालत की दहलीज पर हारी शाहीन! कोर्ट के इस फैसले से टूट गई एसिड अटैक सर्वाइवर
Shaheen Malik: "मैं तेजाब के हमले से नहीं टूटी थी, लेकिन आज न्याय व्यवस्था ने मुझे तोड़ दिया।" ये शब्द शाहीन मलिक के हैं। जिन्होंने अपनी जिंदगी के 16 बेशकीमती साल सिर्फ एक उम्मीद में गुजार दिए कि एक दिन अदालत उनके गुनहगारों को सजा देगी। लेकिन दिल्ली की रोहिणी कोर्ट से आए हालिया फैसले ने न केवल शाहीन, बल्कि न्याय की आस लगाए बैठे हजारों पीड़ितों को झकझोर कर रख दिया है।
क्या है पूरा मामला?
साल 2009 में, 26 साल की शाहीन मलिक हरियाणा के पानीपत में एक स्टूडेंट काउंसलर के तौर पर काम कर रही थीं। वह एमबीए की पढ़ाई कर रही थीं और अपने करियर की ऊंचाइयों को छूने का सपना देख रही थीं। तभी उनके ऑफिस के बाहर उन पर तेजाब से हमला किया गया। इस हमले में उनकी एक आंख की रोशनी चली गई और चेहरा बुरी तरह झुलस गया।

बुधवार, 24 दिसंबर को दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने इस मामले में साजिश के आरोपी तीन मुख्य व्यक्तियों और एक नाबालिग को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत का यह फैसला 16 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है।
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25 से ज्यादा सर्जरी और अनगिनत जख्म
शाहीन के लिए यह 16 साल सिर्फ कोर्ट की तारीखें नहीं थीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक यंत्रणा का एक लंबा दौर था।
- शारीरिक कष्ट: चेहरे को ठीक करने के लिए उन्होंने अब तक 25 से ज्यादा सर्जरी कराई हैं।
- सामाजिक चुनौतियां: दिल्ली के एक रूढ़िवादी परिवार से निकलकर अपनी पहचान बनाने वाली शाहीन को इस हमले के बाद समाज की दोहरी मार झेलनी पड़ी।
- आर्थिक बोझ: सालों तक चले इलाज और कानूनी प्रक्रिया ने उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी, फिर भी वह न्याय के लिए डटी रहीं।
'ब्रेव सोल्स फाउंडेशन' (Brave Souls Foundation), खुद जलकर दूसरों को दी रोशनी
शाहीन ने अपने दर्द को अपनी ताकत बनाया। 2013 से वह एसिड अटैक पीड़ितों के लिए काम कर रही हैं।
- फाउंडेशन की स्थापना: 2021 में उन्होंने 'ब्रेव सोल्स फाउंडेशन' शुरू किया।
- 'अपना घर': पीड़ितों के लिए एक शेल्टर होम बनाया, जहां रहने, इलाज और काउंसलिंग की सुविधा मिलती है।
- मदद का हाथ: अब तक वह 300 से अधिक पीड़ितों को मुआवजा, सर्जरी और आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर चुकी हैं।
शाहीन का सवाल है कि, "मेरी संस्था में रहने वाली लड़कियां मुझसे पूछ रही हैं कि दीदी, जब आपको 16 साल बाद इंसाफ नहीं मिला, तो हमें क्या मिलेगा? मैं उन्हें क्या जवाब दूं?"
फैसले का समाज पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के फैसले गंभीर संदेश देते हैं:
- पीड़ितों का हौसला टूटना: लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आरोपियों का बरी होना पीड़ितों को शिकायत दर्ज करने से रोक सकता है।
- सिस्टम की संवेदनशीलता: शाहीन का कहना है कि न्याय व्यवस्था में बैठे लोग अक्सर उस दर्द को महसूस नहीं कर पाते, जिससे एक सर्वाइवर गुजरता है।
- अपराधियों के हौसले: सजा न मिलने का डर खत्म होने से इस तरह के जघन्य अपराधों में कमी आना मुश्किल है।
थमा नहीं है संघर्ष
शाहीन मलिक ने हार नहीं मानी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) में अपील करेंगी। उनकी लड़ाई अब सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि उन सैकड़ों लड़कियों के लिए है जो उन्हें अपना आदर्श मानती हैं।
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