सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है Sengol, 1947 में पंडित नेहरू को दिया गया था, नए संसद भवन को लेकर है चर्चा में
Sengol: अमित शाह के ऐलान के बाद सेंगोल की काफी चर्चा होने लगी है। सेंगोल बनाने वाले जौहरी के परपोते ने इसको लेकर पूरी कहानी बताई है। कैसे इसका निर्माण हुआ था।

Sengol: नए संसद भवन का उद्घाटन 28 मई को किया जाएगा। इस दिन देश को नया संसद भवन मिलने वाला है। इस बीच केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सेंगोल की कार्फ चर्चा होने लगी है। अमित शाह ने आज बताया कि नए संसद भवन में सेंगोल स्थापित किया जाएगा। इसके बाद चर्चा होने लगी कि आखिर ये सेंगोल क्या है, इसे क्यों स्थापित किया जाएगा।
सेंगोल बनाने वाले जौहरी वुम्मिदी बंगारू चेट्टी के परपोते अमरेंद्र वुम्मिदी ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि दक्षिण भारत के लिए सेंगोल काफी विशिष्ट है। उन्होंने कहा कि इसे बनाने के लिए इसका मूल डिजाइन मेरे परदादा और दादा को थिरुवदुथुराई अथीनम के दृष्टा ने दिया था। इसे बनाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया गया था।
जौहरी वुम्मिदी बंगारू के परपोते जितेंद्र वुम्मिदी ने कहा कि सेंगोल चोल वंश के दौरान नए राजाओं को सत्ता हस्तांतरण की परंपरा का प्रतीक था। सेंगोल (राजदंड) के शीर्ष पर एक 'नंदी' है और उस पर देवी लक्ष्मी की एक छवि है, जो धन और समृद्धि का प्रतीक है। उस समय सेंगोल लॉर्ड माउंटबेटन को दिया गया था। बाद में इसे पंडित नेहरू को सौंप दिया गया था।
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बता दें कि 1947 में भारत से जब अंग्रेज भारत से भागे तब सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में सौंपे गए ऐतिहासिक राजदंड (सेंगोल) की प्रतिकृति चेन्नई के वुम्मिदी बंगारू ज्वेलर्स में रखी गई है। 14 अगस्त 1947 को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दिया गया था, जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए थे।
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