सेंगोल पर अभी क्यों सुलगने लगी यूपी की सियासत? क्या ये है असली एजेंडा?
Sengol row in Parliament: नई संसद भवन में सेंगोल की स्थापना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मई, 2023 को इसके उद्घाटन के मौके पर ही की थी। तब नई संसद भवन के उद्घाटन कार्यक्रम का ज्यादातर विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया था।
लेकिन, पिछले एक साल से अधिक समय से अंग्रेजों से भारतीय जनता को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर यह सेंगोल लोकसभा में रखा हुआ है। लेकिन, विपक्षी दलों की ओर से कभी इसे हटाने जैसी मांग नहीं की। लेकिन, 18वीं लोकसभा के पहल सत्र में ही अचानक यह क्यों किया जा रहा है, ये बड़ा सवाल बन गया है।

सेंगोल कहां से आया?
पहले सेंगोल के बारे में संक्षेप में जान लेना चाहिए। सेंगोल का अतीत आज देश की आजादी के साथ जुड़ा हुआ है। 14 अगस्त, 1947 को पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसे अंग्रेजों से पूरे विधि-विधान के साथ सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर स्वीकार किया था।
इस दौरान कई तमिल विद्वान इस प्रक्रिया को विधिवत संपन्न कराने के लिए उपस्थित थे। पीएम मोदी ने भी जब इसकी संसद में स्थापना की तो तमिल संस्कृति से जुड़े होने की वजह से तमिल विद्वानों का पूरा दल वहां मौजूद था।
सपा को क्यों खटक रहा है सेंगोल?
लेकिन, अब समाजवादी पार्टी को संसद भवन से सेंगोल खटक रहा है। गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जब अपने अभिभाषण के लिए संसद पहुंचीं तो उनके आते और जाते दोनों ही वक्त आगे-आगे सेंगोल चल रहा था।
सपा सांसदों ने अब मांग की है कि संसद में सेंगोल हटाकर संविधान की कॉपी रखी जाए। सपा नेताओं की दलील है कि सेंगोल राजदंड का प्रतीक है, फिर इसे लोकतंत्र के मंदिर में रखने की क्या आवश्यकता है। यूपी के मोहनलालगंज से सपा के नवनिर्वाचित सांसद आरके चौधरी ने इसे हटाने को लेकर स्पीकर ओम बिरला को एक चिट्ठी भी लिखी है।
समाजवादी पार्टी कह रही है कि देश संविधान से चलेगा, न कि राजतंत्र के प्रतीक सेंगोल से। सपा यहां तक कह रही है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए सेंगोल को हटाकर संविधान रखना होगा!
सेंगोल पर सपा के रवैए को मायावती ने बताया 'हथकंडा'
सेंगोल पर सपा के इस रवैए पर बसपा प्रमुख मायावती ने सीधा निशाना साधा है। उन्होंने एक्स पर अपने पोस्ट के जरिए इसे सपा का 'हथकंडा' बताते हुए लोगों को 'सावधान' रहने को कहा है।
बीएसपी सुप्रीमो ने लिखा है, 'सेंगोल को संसद में लगाना या नहीं, इस पर बोलने के साथ-साथ सपा के लिए यह बेहतर होता कि यह पार्टी देश के कमजोर एवं उपेक्षित वर्गों के हितों में तथा आम जनहित के मुद्दों को भी लेकर केंद्र सरकार को घेरती।'
अगले पोस्ट में वो लिखती हैं, 'सच्चाई यह है कि यह पार्टी अधिकांश ऐसे मुद्दों पर चुप ही रहती है तथा सरकार में आकर कमजोर वर्गों के विरूद्ध फैसले भी लेती है। इनके महापुरूषों की भी उपेक्षा करती है। इस पार्टी के सभी हथकंडों से जरूर सावधान रहें।'
सपा नेताओं की अज्ञानता सामने आ रही है- योगी आदित्यनाथ
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी सपा के दलीलों पर पलटवार कर चुके हैं। उन्होंने कहा, 'सपा के मन में भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति कोई सम्मान नहीं है। सेंगोल पर उनके बड़े नेताओं की टिप्पणियां निंदनीय हैं, और उनकी अज्ञानता समाने आती हैं। यह विशेष रूप से तमिल संस्कृति के प्रति इंडी अलायंस की नफरत को भी दिखाता है।
संविधान वाले नैरेटिव से लोकसभा चुनावों में सपा को मिला है फायदा
अगर सपा नेता की मांग को देखें तो उसमें एक बात पूरी तरह से स्पष्ट है। वह सेंगोल की जगह संविधान को स्थापित करने की दलील देने लगे हैं। मतलब, यह विपक्ष के उसी एजेंडे का विस्तार लगता है, जिसका लाभ उसे लोकसभा चुनावों में मिल चुका है।
मायावती भी कह चुकी हैं कि संविधान बचाओ के नाम पर लोगों को गुमराह किया गया है, जिससे उनकी पार्टी को जबर्दस्त नुकसान हुआ है। पार्टी नेताओं के साथ हार की समीक्षा करने के बाद मायावती ने कहा था, 'देश में हाल ही में हुए 18वीं लोकसभा के चुनाव में इस बार विरोधी पार्टियों की ओर विशेषकर संविधान बचाओ जैसे अनेकों मुद्दे के गलत प्रचार से गुमराह होने की वजह से पार्टी का जबर्दस्त नुकसान हुआ है। '
क्या ये है असली एजेंडा?
दरअसल, राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना है कि विपक्ष के इस तरह के दावों और आरोपों की वजह से पहली बार यूपी में ऐसा हुआ है कि दलितों का वोट भी यादवों के साथ शिफ्ट हुआ है। लगता है कि सेंगोल बनाम संविधान के माध्यम से विपक्ष अपने उसी नैरेटिव को जीवित रखकर सरकार को घेरने का दांव चल रहा है।












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