शादी के बाद महिला के धर्म का विलय पति के धर्म में नहीं हो सकता : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि महिला का धर्म पति के धर्म के अनुसार नहीं बदलता है। दरअसल यह फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले पर आया था जिसमें कहा गया था कि शादी के बाद महिला का धर्म उसके पति के धर्म के साथ मिल जाता है, यानी वह अपने आप पति के धर्म की हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोरोऑस्ट्रियन ट्रस्ट से कहा है कि वे कठोर न बनें और पारसी धर्म से बाहर शादी करने करने वाली पारसी महिला को पिता की मृत्यु पर प्रार्थना के लिए टावर ऑफ साइलेंस जाने की इजाजत देने पर विचार करें। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने ट्रस्ट से कहा कि कठोरता धर्म के सिद्धांत को समझने के लिए हमेशा सही नहीं होती।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने ट्रस्ट से कहा कि वह इस पर अगले हफ्ते अपना रुख कोर्ट को बताए। मामले की 14 दिसंबर को अगली सुनवाई होगी।
बेंच ने कहा कि 'शादी के आधार पर ही किसी महिला को उसके मानवीय अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। शादी का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि महिला अपने पति की बंधक बन गई। हम धार्मिक विलय को भी स्वीकार नहीं करते हैं जैसा कि बॉम्बे हाई कोर्ट की तरफ से कहा गया है। ऐसा कोई कानून नहीं है जो महिला को 'टावर ऑफ साइलेंस' में जाने से रोके।' पारसी समुदाय में 'टावर ऑफ साइलेंस' उस जगह को कहते हैं, जहां मृत शरीर को अंतिम गति के लिए छोड़ा जाता है। दरअसल महिला ने दूसरे धर्म के शख्स से शादी की थी, इस वजह से उसे पैरंट्स के अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोका गया था।
दरअसल हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि पारसी महिला अपने धर्म का अधिकार खो देती है जब वह किसी दूसरे धर्म के पुरुष से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करती है। इतना ही नहीं हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि अब आप पारसी नहीं रहीं भले ही आपने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी की है।
बेंच ने कहा कि स्पेशल मैरिज ऐक्ट इसीलिए लागू किया गया है ताकि अलग-अलग धर्मों के लोग शादी करके भी अपने धर्म के अनुसार आस्था रख सकें। यहां महिला के धर्म का विलय पति के धर्म के साथ होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है जबतक की वह स्वयं पति का धर्म स्वीकार न करे।












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