Kanwar Yatra 2023: याद आएंगे 6 करोड़ का सोना लादने वाले गोल्डन बाबा, पाप धोने के लिए बने थे शिव भक्त
Golden Baba: आज यानी 4 जुलाई से सावन का महीना शुरू हो चुका है। इस मौके पर शिव भक्तों का मंदिरों में तांता लग जाता है। इस मौके पर कांवड़ यात्रा भी बड़े जोरों-शोरों से होती है। लेकिन बीते कुछ सालों से कांवड़ यात्रा में जान डाल देने वाले गोल्डन बाबा यात्रा में नहीं नजर आते।
कौन थे सन्यासी गोल्डन बाबा?
गोल्डन बाबा के नाम से पूरे देश में मशहूर पूर्वी दिल्ली के रहने वाले सुधीर कुमार मक्कड़ कांवड़ यात्रा में हर बार धूम मचा देते थे। लेकिन कोविड के दौरान उनके निधन ने लोगों को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद से यात्रा भक्तों को उनके बिना अधूरी सी लगती है। अब जब सावन की शुरुआत हो चुकी है तो लोग फिर उन्हें याद कर रहे हैं। ऐसे में चलिये जानते हैं सन्यासी गोल्डन बाबा के बारे में...

जुर्म की दुनिया के बेताज बादशाह
लोगों के बीच सन्यासी बनकर उभरे गोल्डन बाबा हमेशा से सन्यासी नहीं थे। इससे पहले वे जुर्म की दुनिया के बेताज बादशाह हुआ करते थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि गोल्डन बाबा के नाम से मशहूर सुधीर मक्कड़ के खिलाफ हत्या, फिरौती, उगाही से लेकर जान से मारने की धमकी तक के मुकदमे दर्ज थे।
क्यों पड़ा गोल्डन बाबा नाम?
जुर्म की बात से परे अगर उनके नाम की बात की जाए तो जैसा कि नाम से ही जाहिर है, गोल्डन बाबा उनका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वे खूब सारा सोना धारण करते थे। पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर में रहने वाले उनके शिष्य ने ही बताया कि साल 1972 से ही बाबा को सोना पहनना काफी पसंद था। वो सोने को अपना देवता मानते थे। ऐसे में वे किलो के हिसाब से सोना धारण करके रखते थे। फिर बात चाहे गले की हो या फिर हाथों की। वे मोटी-मोटी चेन पहनते थे।
पाप धोने के लिए बने शिव भक्त
ऐसा माना जाता है कि गोल्डन बाबा अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए पूजा-पाठ में लीन हुए थे। वे आध्यात्म की शरण में इसलिए ही आए थे, ताकि अपने पापों को धो सकें। वे हर साल कांवड़ लेने आते थे। हैरत भरी बात है कि उनकी सुरक्षा में 30 निजी गार्ड्स लगे हुए थे। बाबा हर साल हरिद्वार से कांलड़ लाते थे। वे भोले बाबा के भक्त थे।
बढ़ती चली गई भक्तों की संख्या
कई संगीन आरोपों के बावजूद वक्त के साथ उनके अनुयायियों में इजाफा ही होता रहा। बताया जाता है कि वे कभी दिल्ली में गारमेंट्स का कारोबार करते थे। लेकिन अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने सन्यासी बनने का फैसला लिया। ज्यादातर लोग मानते थे कि वे दिल के बेहद साफ थे और लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।












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