सऊदी अरब धार्मिक आज़ादी पर अमेरिकी ब्लैक लिस्ट में शामिल, भारत को बाहर रखने पर विरोध
अमेरिकी सरकार की एजेंसी 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' ने धार्मिक आज़ादी का उल्लंघन के लिहाज से सबसे चिंताजनक देशों की ब्लैक लिस्ट में सऊदी अरब का नाम शामिल किया है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि इस ब्लैक लिस्ट में सेंट्रल अफ़्रीकी रिपब्लिक में हुए खूनखराबे में शामिल रहे लड़ाकों के समूह 'वैग्नर ग्रुप' का नाम भी जोड़ा गया है.
इसके साथ ही लातिन अमेरिकी देश क्यूबा और निकारागुआ को भी ब्लैकलिस्टेड किया गया है. इस समय इस सूची में कुल बारह देशों के नाम हैं.
ये देश हैं- सऊदी अरब, क्यूबा, निकारागुआ, चीन, ईरान, इरीट्रिया, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, म्यांमार.
इसके साथ ही अमेरिका ने अल्जीरिया, सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक, कोमोरोस, और वियतनाम को विशेष निगरानी सूची में रखा है. इस लिस्ट में से भारत को बाहर रखा गया है जिसे लेकर 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' ने सरकार के प्रति नाराज़गी जताई है.
सऊदी अरब पर क्या कहा गया है
'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' के कमिश्नर स्टीवन स्नेक ने बताया है कि सऊदी अरब की सरकार इस्लाम से इतर किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल के निर्माण को प्रतिबंधित करती है.
उन्होंने कहा, "सऊदी अरब इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म के पूजा स्थलों के निर्माण को प्रतिबंधित करता है. सरकार की ओर से विरोध करने वाले धार्मिक नेताओं को भी हिरासत में रखना जारी है. और सऊदी राज परिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता के इन उल्लंघनों के लिए खुली छूट नहीं दी जा सकती."
उन्होंने ये भी कहा, "सऊदी अरब सरकार लगातार धार्मिक आज़ादी का उल्लंघन करती आई है. ये उल्लंघन सरकार के उन दावों को कमतर करते हैं जिनमें कहा गया है कि वहां अलग-अलग क्षेत्रों में प्रगति हुई है. अमेरिका को सऊदी अरब सरकार से लगातार आग्रह करना चाहिए कि वह धार्मिक आज़ादी के प्रति ज़्यादा सम्मानजनक भाव रखे."
'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' दुनिया भर में उन मुल्कों पर नज़र रखता है जहां धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के मामले सामने आते हैं. इसके बाद यह आयोग इन मुल्कों को विशेष सूचियों में दर्ज करने के लिए अमेरिकी सरकार को अपने सुझाव देती है.
इस आयोग की रिपोर्ट में सामने आया है कि 'सऊदी अरब में शिया मुसलमानों को शिक्षा, रोजगार और न्यायपालिका में भेदभाव का सामना करना पड़ता है. इसके साथ ही सेना और सरकार के उच्च पदों तक भी उनकी पहुंच नहीं है.
सऊदी अरब के कुछ इलाकों में शिया बहुमत वाले क्षेत्रों के बाहर शिया मस्जिदों का निर्माण अभी भी प्रतिबंधित है. इसके साथ ही सरकारी संस्थाएं अभी भी इन इलाकों में शिया समुदाय के धार्मिक आह्वानों पर रोक लगाए हुए हैं.
यही नहीं, आयोग की वेबसाइट पर मौजूद दस्तावेज़ों के मुताबिक़, 'सऊदी अरब में ईसाई, यहूदी समेत अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय सिर्फ निजी स्तर पर मुलाक़ातें कर सकते हैं. सऊदी अरब ने कभी-कभी धार्मिक विरोधियों के ख़िलाफ़ जासूसों का इस्तेमाल किया जाता है.'
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भारत को बाहर रखने पर विरोध
अमेरिकी आयोग ने इस साल जून में भारत को भी इस सूची में रखने का सुझाव दिया था. इस पर भारत सरकार ने अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट को 'पक्षपातपूर्ण' और 'ग़लत' बताया था.
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि 'अफ़सोस की बात है, यूएससीआईआरएफ़ अपनी रिपोर्टों में बार-बार तथ्यों को गलत तरीक़े से पेश करना जारी रखे हुए है.'
भारत ने कहा था कि 'हम अपील करेंगे कि पहले से बनाई गई जानकारियों और पक्षपातपूर्ण नज़रिये के आधार पर किए जाने वाले मूल्याकंन से बचा जाना चाहिए.'
अमेरिकी आयोग पिछले तीन सालों से अमेरिकी विदेश मंत्रालय से भारत को चिंताजनक देशों की सूची में डालने की अपील कर रहा है. लेकिन अब तक भारत को इस सूची में नहीं डाला गया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, 'भारतीय अमेरिकी मुस्लिम परिषद' और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आज़ादी से जुड़े अमेरिकी आयोग की ओर से अमेरिकी विदेश मंत्रालय पर इस एलान से पहले इस सूची में भारत का नाम रखे जाने को लेकर भारी दबाव अभियान चलाया गया था.
लेकिन अमेरिकी सरकार ने साल के अंत में इस लिस्ट में भारत का नाम नहीं रखा है. इस पर अमेरिकी आयोग की ओर से नाराज़गी जताई गई है.
'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' के चेयरमैन नूरी टुरकेल ने कहा, "विदेश मंत्रालय का नाइजीरिया और भारत को धार्मिक आज़ादी के उल्लंघन करने वालों के रूप में पहचान न देने की कोई वजह समझ नहीं आती. क्योंकि दोनों मुल्क चिंताजनक हालातों वाले देशों की सूची में रखने के लिए ज़रूरी सभी क़ानूनी मानकों को पूरा करते हैं. आयोग इस बात से बेहद निराश है कि विदेश मंत्री ने हमारे सुझावों को पारित नहीं किया."
नूरी ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय को घेरते हुए ये भी कहा है कि विदेश मंत्रालय को स्वयं भी इन देशों में धार्मिक आज़ादी के उल्लंघन के उदाहरण मिले हैं.
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