Sanjay Gandhi death anniversery: शव के टुकड़ों को समेटने में लग गए थे तीन घंटे, हिल गया था पूरा गांधी परिवार
आज से 43 साल पहले 23 जून 1980 को गांधी परिवार को बड़ा दर्द मिला था। यह दर्द इंदिरा गांधी और मेनका गांधी के लिए सबसे अधिक असहनीय था। दरअसल, इसी दिन इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई थी। इस घटना ने पूरे गांधी परिवार को हिलाकर रख दिया था। आज संजय गांधी की 43वीं पुण्यतिथि है। चलिए आज आपलोगों को बताते हैं आखिर उस दिन क्या हुआ था? संजय गांधी कैसे हो गए थे विमान दुर्घटना के शिकार? इंदिरा गांधी ने फिर क्या किया?
सबसे पहले संजय गांधी का प्रारंभिक जीवन
संजय गांधी का जन्म नई दिल्ली में 14 दिसंबर 1946 को हुआ था। वह दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सबसे छोटे बेटे थे और राजीव गांधी के छोटे भाई थे। संजय गांधी की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलंबा स्कूल में हुई थी। इसके बाद उनकी पढ़ाई वेल्हम बॉयज स्कूल, देहरादून में भी हुई। 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं लिया, लेकिन ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग को करियर के रूप में चुना और तीन साल के लिए इंग्लैंड के क्रेवे में रोल्स-रॉयस के साथ ट्रेनिंग हासिल की।

संजय गांधी को विमान कलाबाजी में जबरदस्त रुचि थी
संजय गांधी ने 1976 में पायलट का लाइसेंस भी प्राप्त किया। उन्हें विमान कलाबाजी में रुचि थी और उन्होंने उस खेल में कई पुरस्कार जीते। संजय विमान को कार की तरह चलाया करते थे। तेज हवा में कलाबाजियां खाना उनका शौक हुआ करता था। यही कलाबाजी उनकी मौत का कारण भी बना। उन्हें स्पोर्ट्स कारों में खासी रुचि थी।
संजय गांधी की राजनीति में रुतबा
1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं और फिर संजय गांधी अपनी इंटर्नशिप बीच में ही छोड़ कर देश वापस आ गए। इसके बाद संजय गांधी राजनीति में कूद पड़े। फिर देश के कोन-कोने में अपना दबदबा कायम करने लगे। इंदिरा गांधी के हर फैसले में वह शामिल होते थे। संजय गांधी आपातकाल के दौरान राजनैतिक तौर पर सक्रिय हुए और वे इंदिरा गांधी के सलाहकार के तौर पर पहचाने गए। इतना ही नहीं अक्सर वे दूसरे के मंत्रालय और विभागों में भी सीधे दखल दे देते थे। आपातकाल में लगाए गए कड़े प्रतिबंध के लिए तो संजय गांधी को ही अकेला जिम्मेदार माना जाता है। संजय गांधी की पहचान हुई एक ऐसे बेटे के तौर पर जिसने मां की सत्ता का इस्तेमाल अपने लिए ज्यादा किया।
ऐसे हुई थी संजय गांधी की दर्दनाक मौत
23 जून 1980 का दिन जब आम दिन की तरह ही प्रधानमंत्री आवास के बाहर लोगों की भीड़ जुटने लगी थी। लेकिन संजय गांधी कुछ और ही काम के लिए लगे थे। वह विमान की कलाबाजी दिखाने के लिए बेहद उत्सुक थे। विमान का नाम था पिट्स एस 2 ए जिसे मई 1980 में जाकर भारत के कस्टम विभाग ने भारत लाने की मंजूरी दी। हालांकि 1977 में ही इसे लाने का प्रयास हो रहा था। इस विमान को सफदरजंग हवाई अड्डे स्थित दिल्ली फ्लाइंग क्लब में पहुंचा दिया गया। 21 जून 1980 को पहली बार संजय गांधी ने इस विमान पर हाथ फेरा था।
23 जून को था वह काला दिन जिसने छीन ली संजय की जिंदगी
23 जून को माधवराव सिंधिया उनके साथ पिट्स की उड़ान भरने वाले थे। लेकिन संजय गांधी सिंधिया के बजाए दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के घर जा पहुंचे। उन्होंने कैप्टन सक्सेना से कहा कि वह उनके साथ फ्लाइट पर चलें। सुभाष अपने एक सहायक के साथ फ्लाइंग क्लब के मुख्य भवन में पहुंचे। इसके कुछ देर बाद उन्हें संजय गांधी की तरफ से बुलावा आया फिर वह उस विमान में पहुंचे जहां संजय गांधी मौजूद थे।
कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में बैठे और संजय ने पिछले हिस्से में बैठकर कंट्रोल संभाला। ठीक सात बजकर 58 मिनट पर उन्होंने टेक ऑफ किया। संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए। वो चौथी लूप लगाने ही वाले थे कि कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है। फिर कुछ ही देर में उनका कंट्रोल विमान पर खत्म हो गया. घर्र घर्र की आवाज आई और प्लेन तेजी से नीचे आने लगा।
संजय गांधी के शव के टुकड़े को समेटने में 3 घंटे लगे
इस भीषण विमान दुर्घटना में संजय गांधी के चिथड़े चिथड़े उड़ गए। डॉक्टर के मुताबिक संजय गांधी के शव के टुकड़े को समेटने में तीन घंटे से अधिक लग गए। जब तक डॉक्टर संजय के क्षत-विक्षत शव को समेटने और जोड़ने की कोशिश करते रहे, इंदिरा गांधी उसी कमरे में खड़ी रहीं। संजय गांधी की एक आंख और सिर पर अभी भी पट्टी बंधी हुई थी और नाक बुरी तरह से कुचली हुई थी।
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