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RSS से सरकारी कर्मचारियों को क्यों किया गया था दूर? क्या था प्रतिबंध वाला 30 नवंबर 1966 का वह मूल आदेश?

RSS related ban lifted: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के संघ की गतिविधियों में शामिल होने पर लगी पाबंदी हटाने के मोदी सरकार के फैसले का स्वागत किया है। यह प्रतिबंध 30 नवंबर,1966 को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने लगाया था।

आरएसएस ने कहा है कि यह प्रतिबंध राजनीति से प्रेरित था और पाबंदी हटाए जाने से 'भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 9 जुलाई, 2024 को 58 साल पुराने सरकारी आदेश को बदल दिया था। जिसे सबसे पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर अपने पोस्ट में साझा किया है।

rss ban removed

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी- पाबंदी हटने पर आरएसएस की प्रतिक्रिया
सोमवार को आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने एक बयान में कहा है, 'अपने राजनीतिक हितों की वजह से तबकी सरकार ने बिना किसी आधार के सरकारी कर्मचारियों को संघ जैसे रचनात्मक संगठन की गतिविधियों में हिस्सा लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था। 'सरकार का मौजूदा फैसला उचित है और इससे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।'

मोदी सरकार का प्रतिबंध हटाने वाला आदेश क्या है?
आरएसएस की गतिविधियों में सरकारी सेवकों के हिस्सा लेने के संबंध में 30 नवंबर 1966, 25 जुलाई 1970 और 28 अक्टूबर 1980 के निर्देशों की समीक्षा के बाद यह फैसला किया गया है कि इन तीनों ऑफिस मेमो से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का जिक्र हटाया जाए।

सरकारी कर्मचारियों के RSS से जुड़ने पर क्यों लगाई गई थी पाबंदी?
7 नवंबर, 1966 को दिल्ली में गौरक्षा और गौहत्या विरोधी एक विशाल आंदोलन हुआ था। आंदोलनकारियों ने इस दौरान संसद का भी घेराव किया। इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्थन प्राप्त था। इसमें हजारों गौ-भक्त, साधु-संत और हिंदू संगठनों के लोग शामिल हुए थे।

कहा जाता है कि इस आंदोलन में सवा लाख से ज्यादा आंदोलनकारी एकजुट हो गए थे। प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क उठी और तत्कालीन इंदिरा सरकार पर आरोप है कि उसकी पुलिस ने आंदोलनकारियों के खिलाफ लाठीचार्ज, आंसू गैस और फायरिंग का इस्तेमाल करके इसे पूरी तरह से कुचल की कोशिश की थी।

इस हिंसा में बड़े पैमाने पर लोगों के मारे जाने की बातें कही जाती हैं, जिसमें साधु-संत भी शामिल थे। इस आंदोलन में मारे गए लोगों का आंकड़ा हमेशा ही संदेह के घेरे में रहा है।

हालांकि, इस घटना की वजह से इंदिरा सरकार पर इतना दबाव बढ़ गया था कि तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को अपना पद छोड़ना पड़ा। इसी घटना के बाद इंदिरा सरकार का वह विवादास्पद फैसला आया, इसलिए पाबंदी को उस आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है।

क्या था 30 नवंबर, 1966 का वह आदेश?
केंद्र सरकार के कर्मचारियों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ने पर पाबंदी गौ-रक्षा आंदोलन के बाद ही लगाई गई थी। 30 नवंबर, 1966 को इंदिरा सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया था, 'क्योंकि सरकारी कर्मचारियों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी की सदस्यता और उनकी गतिविधियों में भागीदारी को लेकर सरकार की नीति के बारे में कुछ संदेह उठाए गए हैं....यह स्पष्ट किया जाता है कि सरकार ने हमेशा से इन दोनों संगठनों की गतिविधियों को इस तरह का माना है कि सरकारी कर्मचारियों का उसमें भाग लेने पर केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियम (Central Civil Services Conduct Rules) लागू होंगे।'

इसके साथ ही इस आदेश में सरकारी कर्मचारियों के संघ से जुड़ने पर सीधे तौर पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उस आदेश में ही आगे कहा गया था, 'कोई भी सरकारी सेवक, जो उपर्युक्त संगठनों का सदस्य है या उनकी गतिविधियों से जुड़ा हुआ है, अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उत्तरदायी है।'

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