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RSS के कार्यक्रमों में सरकारी कर्मचारियों के शामिल होने पर लगी पाबंदी क्यों हटी? 58 साल से लगा था प्रतिबंध

RSS Ban Lifted: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 58 साल पुराने एक सरकारी आदेश को पलट दिया है। 1966 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) की गतिविधियों में शामिल होने पर रोक लगाई थी, जिसे अब हटा लिया गया है।

मोदी सरकार के 9 जुलाई, 2024 के इस आदेश को पहले कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स हैंडल पर शेयर किया। बाद में बीजेपी के आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने भी एक्स पर इसे साझा किया। हालांकि, इन दोनों ने इस फैसले को अलग-अलग राजनीतिक चश्मों से देखा है।

rss ban lifted

सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस से दूर रखने का निर्णय सही था- कांग्रेस
जयराम रमेश ने सरकारी आदेश के स्क्रीन शॉट के साथ-साथ 1966 वाले आदेश की भी फोटो लगाई है और लिखा है, 'फरवरी 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था।......1966 में, आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने वाले सरकारी कर्मचारियों पर प्रतिबंध लगाया गया था; और यह सही निर्णय भी था। यह 1966 में बैन लगाने के लिए जारी किया गया आधिकारिक आदेश है।'

कांग्रेस ने संघ और सरकार में कथित मतभेद को बताया पाबंदी हटाने की वजह
उन्होंने ताजा फैसले पर लिखा है, '4 जून 2024 के बाद, स्वयंभू नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री और आरएसएस के बीच संबंधों में कड़वाहट आई है। 9 जुलाई, 2024 को 58 साल का प्रतिबंध हटा दिया गया जो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान भी लागू था। मेरा मानना है कि नौकरशाही अब निक्कर में भी आ सकती है।' हालांकि, अब संघ के स्वयं सेवकों ने खाकी हाफ पैंट की जगह फुलपैंट अपना लिया है।

मोदी सरकार ने 58 साल पुराने अंसवैधानिक आदेश को हटाया- बीजेपी
वहीं अमित मालवीय ने सरकारी आदेश की कॉपी पोस्ट करते हुए कहा है, '1966 में 58 वर्ष पहले जारी असंवैधानिक आदेश जिसमें सरकारी कर्मचारियों के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में शामिल होने पर प्रतिबंध थोपा गया था, मोदी सरकार की ओर से हटा लिया गया है। मूल आदेश पहले तो पास ही नहीं होना चाहिए था।'

मोदी सरकार ने क्यों हटाया सरकारी कर्मचारियों पर लगा प्रतिबंध?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का यह तीसरा कार्यकाल है। पिछले दो कार्यकालों में जब बीजेपी के पास अपना पूर्ण बहुमत था, तब भी यह फैसला लिया जा सकता था। लेकिन, सवाल है कि तीसरे कार्यकाल में इसकी आवश्यकता क्यों महसूस की गई है?

लोकसभा चुनाव में नौकरशाही ने बीजेपी को हराने वालों का साथ दिया?
इस बार बीजेपी पूर्ण बहुमत से पीछे रही है, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश में पार्टी का उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं होना है। अगर यूपी में भाजपा अपना पिछला प्रदर्शन भी दोहरा लेती तो जादुई आंकड़े के करीब पहुंच सकती थी। कहा जा रहा है कि यूपी में इस बार के चुनाव में नौकरशाही ने भाजपा के खिलाफ काम किया। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पुरानी पेंशन स्कीम (OPS) को माना जा रहा है।

संघ की शिक्षा से 'निजी हित' की जगह राष्ट्रहित में सोचेंगे सरकारी कर्मचारी?
हो सकता है कि केंद्र सरकार को लग रहा हो कि संघ की विचारधारा से जुड़ने के बाद देश की नौकरशाही 'निजी हित' से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में ज्यादा सोचना शुरू कर दें। हो सकता है कि वह सोच रही हो कि जब सरकारी कर्मचारी समझेंगे कि लंबे समय में पुरानी पेंशन स्कीम देश की अर्थव्यवस्था की नींव हिला सकती है तो वह नई व्यवस्था को आसानी से स्वीकार करना शुरू कर देंगे।

कोर हिंदुत्व विचारधारा की ओर वापसी का संकेत!
इस बार के चुनाव परिणामों के बाद बीजेपी विचारधारा से जुड़े लोग और पार्टी के अंदर से भी इस तरह की आवाजें उठी हैं कि 'सबका साथ, सबका विकास' वाली राजनीति करना पार्टी के लिए मुमकिन नहीं है।

क्योंकि, ऐसे लोगों को लग रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी चाहे, जितना भी निष्पक्ष होकर सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाएं, मुसलमान गोलबंद होकर उसे ही वोट देंगे, जो बीजेपी को हराने में सक्षम होगा। ऐसे में हो सकता है कि पार्टी अपने हार्डकोर हिंदुत्व की ओर मुड़ने में ही भलाई समझ रही हो और इसलिए ऐसा फैसला लिया गया है, जिसपर होने वाला हर हमला उसे अपने कोर वोटरों को एकजुट करने में सहायता करेगा।

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