अनंत सिंह समेत बाकी आपराधिक छवि वालों को टिकट देने का RJD का तर्क खतरनाक है

नई दिल्ली- बिहार में दागी उम्मीदवारों का ब्योरा सार्वजनिक करने के मामले में राजद ने बाकी सभी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया है। लालू यादव की पार्टी का बीते 15 वर्षों से सबसे ज्यादा आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट देने का रिकॉर्ड रहा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के आदेश और चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक पार्टी ने सबसे पहले उनका ब्योरा सार्वजनिक करके यह भी साबित कर दिया है कि वह अपने दागी उम्मीदवारों के बारे ताल ठोककर मतदाताओं को बता भी सकती है। लेकिन, चिंता इस बात को लेकर है कि हत्या से लेकर बाकी जघन्य अपराधों में शामिल आपराधिक तत्वों को टिकट देने के लिए पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर आधिकारिक तौर पर जो दलीलें दी हैं, वह लोकतंत्र के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा सकते हैं।

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    RJDs logic for giving tickets to other criminal elements including Anant Singh is dangerous

    अनंत सिंह पर हत्या के 7 केस दर्ज
    राष्ट्रीय जनता दल ने इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में जिन आपराधिक तत्वों को चुनाव लड़ने का टिकट दिया है, उनमें से अनंत सिंह का नाम सबसे 'कुख्यात' है। मोकामा क्षेत्र में 'छोटे सरकार' कहलाना पसंद करने वाले अनंत सिंह पर कम से कम 38 आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 7 तो हत्या के केस हैं। उनपर पहला केस 1976 में ही दर्ज हुआ था। उनपर एके-47 राइफल रखने का भी एक केस है, जो उनके घर से बरामद हुआ था। लेकिन, वह पटना जिले के मोकामा से लालू यादव की पार्टी से चुनाव लड़ेंगे। अनलॉफुल ऐक्टिविटीज प्रिवेंशन ऐक्ट के तहत पटना की बेऊर जेल में बंद खुद अनंत सिंह को अपने नामांकन को लेकर इतना डर था कि उन्होंने अपनी पत्नी को भी निर्दलीय पर्चा दाखिल करवाया। ताकि, यदि उनका पर्चा रद्द हो जाए तो उसी सीट से उनकी पत्नी नीलम देवी मैदान में रहें। लेकिन, जब अनंत का पर्चा रद्द नहीं हुआ तो नीलम देवी ने अपना नामांकन वापस ले लिया।

    राजद ने बेवसाइट पर दी हैरान करने वाली दलील
    अनंत सिंह जैसे लोगों को टिकट देने की सफाई के तौर पर राजद की ओर से जो दलीलें दी गई हैं, वह बहुत ही अजीब हैं। पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर तर्क दिया है कि वह किसी भी दूसरे प्रत्याशियों से ज्यादा लोकप्रिय हैं। पार्टी ने उन्हें यह भी सर्टिफिकेट दे दिया है कि वह हमेशा समाज के गरीबों और दबे-कुचलों को उठाने के लिए तैयार रहते हैं। वह हमेशा उस इलाके के गरीबों की मदद के लिए तैयार रहते हैं, इसी के चलते उनके खिलाफ इतने ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज हैं। पार्टी का ये भी तर्क है कि 'इलाके में उनकी लोकप्रियता के कारण दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में उनकी जीत की संभावना ज्यादा है।' राष्ट्रीय जनता दल ने अपने 38 दागी उम्मीदवारों के बचाव में लगभग ऐसे ही तर्क रखे हैं। सवाल उठता है कि अगर सियासी दलों की ऐसी दलीलें ही कथित अपराधियों की बेगुनाही का पैमाना होगा तो फिर अदालतों की क्या जरूरत है?

    अनंत सिंह को पहले 'असामाजिक तत्व' कहते थे तेजस्वी
    जिस दागी उम्मीदवार अनंत सिंह के बारे में आज राजद यह कह रहा है कि उन्होंने गरीबों की मदद की है, इसलिए उनके खिलाफ इतने आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, उन्हीं के बारे में उसके नेता तेजस्वी यादव पहले कहते थे कि वह एक 'असामाजिक तत्व' हैं। लालू यादव भी अनंत सिंह की दबंगई का पहले खूब विरोध कर चुके हैं। लालू यादव के दबाव पर ही पुटुस यादव के अपहरण और हत्या के केस में तीन बार के एमएलए को नीतीश सरकार को गिरफ्तार करके जेल भेजना पड़ा था। लेकिन, आज राजद को उनका अपराध नहीं दिख रहा, जीतने लायक वोट बैंक दिख रहा है।

    दागियों को टिकट देने में राजद आगे-रिपोर्ट
    एडीआर और बिहार इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि बिहार की सभी राजनीतिक पार्टियों में दागी घुसे हुए हैं। लेकिन, 2005 से 2019 के रिकॉर्ड से पता चलता है कि इसमें राष्ट्रीय जनता दल ने सबसे ज्यादा दागी छवि वाले उम्मीदवारों पर भरोसा किया है। जबकि, जीतने वाले दागियों में जदयू आगे है। रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि अगर बिहार में आपराधिक तत्वों की जीत का प्रतिशत 15 है तो साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत सिर्फ 5 है।

    सियासी दलों को सिर्फ 'जीत' चाहिए
    राजद की दलीलों से ऐसा भी लगता है कि कहीं ना कहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश और चुनाव आयोग की गाइडलाइंस का मकसद ही बेमानी हो गई है। यानि किसी उम्मीदवार पर कितने ही गंभीर आरोप क्यों ना हों, अगर उसमें जाति और धर्म आधारित राजनीति के दम पर चुनाव जीतने की क्षमता है तो सियासी दल अपने स्वार्थ के लिए उन्हें बढ़ावा दे सकते हैं। इसका परिणाम ये होगा कि जबतक अदालत में मुकदमे पर आखिरी फैसला नहीं आएगा तब तक ऐसे दागी चेहरे कई टर्म तक लोकतंत्र के मंदिर में लोकतंत्र का उपहास बनाते रहेंगे!

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