क्या बिहार में लालू के 'चिराग' ही बुझाएंगे 'लालटेन'?

नई दिल्ली- बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी इस चुनाव में अंदरूनी मुश्किलों की वजह से जबर्दस्त ढंग से घिरी हुई है। पार्टी सत्ताधारी एनडीए के खिलाफ बने गठबंधन की अगुवा है, लेकिन उसके मुख्य परिवार ही घमासान मचा हुआ है। एक तो पार्टी के सर्वेसर्वा लालू यादव चारा घोटाले में सजा मिलने के चलते चुनाव में सक्रिय नहीं हो पाने को को मजबूर हैं, दूसरी ओर उनके बच्चों के बीच अंदर ही अंदर वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई है। माता-पिता के दबाव के चलते पार्टी पर दबदबे की इस लड़ाई को अभी तक काफी हद तक दबा कर रखा गया है, लेकिन अगर मौजूदा चुनाव में नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं रहे, तो स्थिति विस्फोटक हो भी सकती है।

पार्टी और परिवार पर तेजस्वी का दबदबा

पार्टी और परिवार पर तेजस्वी का दबदबा

मौजूदा समय में औपचारिक और अनौपचारिक दोनों रूप से राष्ट्रीय जनता दल पर लालू-राबड़ी के छोटे बेटे तेजस्वी यादव का दबदबा कायम है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लालू यादव ने उन्हें ही अपना सियासी वारिस माना है। 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद जब आरजेडी-जेडीयू की सरकार बनी, तब भी तेजस्वी यादव ही उपमुख्यमंत्री बनाए गए। आज भी पार्टी से जुड़ा हर अहम फैसला तेजस्वी यादव ही पिता की सहमति से ले रहे हैं और वही गठबंधन में शामिल बाकी दलों के नेताओं से भी बात करते हैं। पार्टी में उनका वर्चस्व इस कदर है, कि उनके सामने न तो उनकी बड़ी बहन मीसा भारती बोल पाती हैं और न ही उनके सामने बड़े भैया तेज प्रताप यादव की एक सुनी जाती है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लालू-राबड़ी परिवार के एक अंदरूनी सूत्र के हवाले से बताया है कि, " तेजस्वी दिल्ली में क्रिकेट खेलते थे। जब वो राजनीति में आए, तो न सिर्फ इसकी पेंचीदगियों को समझा, बल्कि कड़ी मेहनत और समर्पण से अपना एक स्थान कायम किया।" जिस व्यक्ति ने यह बात बताई है, वह दोनों भाइयों को बचपन से देखता आ रहा है। लेकिन, तेजस्वी का ये बढ़ता कद ही फसाद की जड़ बन चुका है।

तेज प्रताप हैं सामने का संकट

तेज प्रताप हैं सामने का संकट

लालू-राबड़ी के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने अपने बर्ताव के कारण कई बार अपने माता-पिता और पार्टी को दुविधा में डाल दिया है। कई दफे उनकी पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते उनके छोटे भाई के सामने राजनीतिक मुश्किलें भी पैदा हुई हैं। लेकिन, उन्होंने तुरंत ही खुद को कृष्ण और छोटे भाई को अर्जुन के रूप में पेश कर स्थिति की गंभीरता को तुरंत ही हल्का भी बनाने की कोशिश की है। हालांकि, इतना तो तय है कि उनकी आए दिन की हरकतों ने चुनाव के समय में पार्टी नेताओं और कैडर को न सिर्फ असमंजस में डाला है, बल्कि कई मौकों पर परिवार की भी फजीहत करवा दी है। उन्होंने अपने चहते उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने पर न सिर्फ पार्टी के यूथ विंग के चीफ पद से इस्तीफा दिया है, बल्कि दो सीटों पर आरजेडी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ अपने नए संगठन 'लालू-राबड़ी मोर्चा' के बैनर के तहत अपना प्रत्याशी भी उतारा है। हालांकि, इसमें बिहार में शिवहर से उनके प्रत्याशी का नामांकन किसी खामी के चलते रद्द हो चुका है। लेकिन, जहानाबाद, में वो अपने उम्मीदवार चंद्र प्रकाश के लिए न सिर्फ प्रचार कर रहे हैं, बल्कि उनकी जीत का दावा भी कर रहे हैं। अब तो उन्होंने जहानाबाद से राजद उम्मीदवार सुरेंद्र यादव को 'आरएसएस एजेंट' भी बताना शुरू कर दिया है। तेज का ये भी आरोप है कि 'आरजेडी प्रत्याशी न सिर्फ गलत आदमी है, बल्कि वह पार्टी में बाधाएं भी खड़ी करना चाहता है।' वे यहां तक कह रहे हैं कि 'सुरेंद्र यादव उनके भाई तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री नहीं बनने देना चाहता।' जाहिर है कि तेज प्रताप के इस रवैए से क्षेत्र में और आसपास की कई सीटों पर भी आरजेडी को नुकसान होने की आशंका बढ़ गई है। लेकिन, माता-पिता के डर से तेजस्वी यादव को भाई के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए कार्रवाई करने की फिलहाल हिम्मत नहीं है।

इससे पहले तेज आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे पर उन्हें और पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। इसी गुस्से में उन्होंने पिछले महीने यूथ विंग की अध्यक्षता छोड़ी थी। वो ये भी दावा कर चुके हैं कि पार्टी में कुछ ऐसे लोग हैं, जो पार्टी और परिवार दोनों को बांटना चाहते हैं।

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पार्टी ही नहीं, परिवार भी है परेशान

पार्टी ही नहीं, परिवार भी है परेशान

तेजप्रताप यादव सिर्फ पार्टी के आधिकारिक लाइन से ही अलग नहीं चल रहे हैं, हाल के कुछ समय में उनकी हरकतों ने परिवार की भी काफी मिट्टी पलीद कराई है। पिछले नवंबर में उन्होंने जब अपनी पत्नी ऐश्वर्या राय से तलाक की अर्जी लगाई तो परिवार के साथ-साथ पार्टी में भी सनसनी मच गई। क्योंकि, शादी सिर्फ 6 महीने पहले ही हुई थी और उनके ससुर चंद्रिका राय आरजेडी के ही एक बड़े नेता हैं। लालू-राबड़ी समेत पूरा परिवार उन्हें तलाक की अर्जी वापस लेने के लिए कहता रहा, लेकिन तेज कत्तई तैयार नहीं हुए। इतना ही नहीं, जब तेजस्वी ने सारण लोकसभा क्षेत्र से तेज के ससुर चंद्रिका राय की उम्मीदवारी घोषित की, तो उन्होंने इसका भी जोरदार विरोध किया। एक समय तो उन्होंने अपनी मां राबड़ी से यहां तक कहा कि सारण सीट से या तो वो खुद लड़ें या फिर वो अपने ससुर के विरोध में चुनाव लड़ेंगे। लेकिन, शायद बाद में लालू से फटकारे जाने के बाद तेज ने ससुर के विरोध करने का फैसला टाल दिया। इसी दौरान उन्होंने अपने माता-पिता के नाम से 'लालू-राबड़ी मोर्चा' बनाने का भी ऐलान किया था। यानी, तेज भले ही अभी परिवार या छोटे भाई के खिलाफ बिगुल नहीं फूंके हों, लेकिन वो कब, क्या और कैसा फैसला लेंगे, इसके बारे में कयास लगाना बहुत ही मुश्किल है। लालू की गैर-मौजूदगी और परिवार के भीतर मचा हुआ यह 'शांतिपूर्ण' कोहराम कब बड़ा रूप लेगा, कहना बहुत कठिन है।

मीसा के मन में क्या चल रहा है?

मीसा के मन में क्या चल रहा है?

लालू-राबड़ी के बड़े बेटे तेज प्रताप उनके घर में जारी बर्चस्व के 'महाभारत' के अकेले किरदार नहीं हैं। अलबत्ता वे ज्यादा मुखर हैं, इसलिए आए दिन सुर्खियों में आते रहते हैं। घर का एक और सदस्य है, जो पार्टी में तेजस्वी यादव के बढ़े कद और अपनी उपेक्षा से अंदर ही अंदर मायूस बैठा है। वो हैं लालू यादव की बड़ी बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती। मीसा न केवल तेज एवं तेजस्वी से बड़ी हैं, बल्कि वो दोनों से कहीं ज्यादा पढ़ी-लिखी भी हैं। शुरुआती दिनों से वो राजनीति में काफी दिलचस्पी लेती रही हैं और पहले सबको यही लगता था कि लालू उन्हें ही अपना राजनीतिक वारिस बनाएंगे। माता-पिता के शासनकाल से ही वो पार्टी के मामलों में दखल देती रही थीं। लेकिन, जब लालू के सामने फैसला लेने का वक्त आया, तो उन्होंने शादीशुदा बेटी की जगह अपने बेटे को तरजीह दी, जो उम्र और शिक्षा में बहन से काफी पीछे थे। मीसा भारती इस चुनाव में भी बिहार के पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार हैं, जिन्हें भाई तेज प्रताप यादव का पूरा समर्थन मिल रहा है। एक आरजेडी नेता की मानें तो, "मीसा महत्वाकांक्षी हैं और राजनीति को अच्छी तरह समझती हैं। वो दोनों भाइयों से ज्यादा शिक्षित और बड़ी हैं एवं लालू की नौ संतानों में सबसे बड़ी भी हैं। उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी की कमान उन्हें ही मिलेगी। लेकिन, उनकी इच्छा के मुताबिक काम नहीं हुआ। वो तेज की नजदीक हैं, जिन्हें राजनीतिक तौर पर चतुर नहीं समझा जाता है। समस्या तब पैदा होनी शुरू हुई, जब दो बड़े भाई-बहनों को दरकिनार करके तेजस्वी को विपक्ष का नेता बना दिया गया।"

लालू के घर की 'महाभारत' का परिणाम क्या होगा?

लालू के घर की 'महाभारत' का परिणाम क्या होगा?

इस बार जब मीसा भारती पाटलिपुत्र से नामांकन दाखिल करने के लिए निकलीं तो उनके साथ तेज प्रताप यादव ही थे। जब उनसे तेज की मौजूदगी और उनकी पार्टी विरोधी गतिविधियों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि, "अगर यह यहां पर है तो इसमें गलत क्या है? यह पार्टी का एमएलए है।" शाम में तेजस्वी भी अपनी बहने के रोड शो में शामिल होने पहुंचे। शुरू में वे अलग कार में चल रहे थे। जब, तेज ने उनसे कहा, तब वो भी उन्हीं की कार में सवार हो गए। यानी भाई-बहनों के बीच सियासी रिश्ते सहज तो नहीं ही दिखते हैं। अलबत्ता, राबड़ी देवी जरूर दावा करती हैं कि," सबकुछ बहुत अच्छा है और सिर्फ मीडिया चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है।" हालांकि, एक चैनल ने जब उनसे पारिवारिक कलह के बारे में ज्यादा गहराई से पूछा तो उन्होंने ये सफाई दी कि 'किस परिवार में मतभेद नहीं होता, छोटा हो या बड़ा। महाभारत कभी खत्म नहीं हो सकता।'

जाहिर है कि लालू-राबड़ी परिवार में मतभेद अब जग-जाहिर हो चुका है। लेकिन, इसका अंजाम क्या होगा, यह सवाल बड़ा है और बहुत कुछ 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा। अगर, बिहार में आरजेडी की अगुवाई वाले गठबंधन ने बढ़िया प्रदर्शन किया, तो पार्टी में तेजस्वी यादव का दबदबा और मजबूत होगा और वे लालू-राबड़ी की राजनीतिक छतरी से बाहर भी निकल सकेंगे। लेकिन, अगर रिजल्ट पार्टी के फेवर में नहीं रहे और मीसा भारती ने पाटलिपुत्र की जंग जीत ली, तो परिवार में भयंकर उथल-पुथल मचने की आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

जो लालू के सामने बोलते नहीं थे, अब मुखर हुए

जो लालू के सामने बोलते नहीं थे, अब मुखर हुए

चुनाव नतीजे आने के बाद जैसे भी हालात बनें, लेकिन परिवार की लड़ाई और लालू की गैर-मौजूदगी के कारण ऐसे नेता भी बगाबत का बिगुल फूंक रहे हैं, जो कभी लालू के सामने बोलने तक की हिम्मत नहीं जुटाते थे। दरभंगा के पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मौलाना अली अशरफ फातमी और सीतामढ़ी के पूर्व सांसद सीताराम यादव का नाम उन्हीं में से एक है। फातमी ने तो मधुबनी से गठबंधन उम्मीदवार के खिलाफ पर्चा भरने तक का ऐलान भी कि था। उन्होंने टिकट नहीं मिलने पर लालू के कई पुराने राज का पर्दाफाश करने की धमकी भी दी थी। जाहिर है कि चुनाव के बाद पार्टी अगर कमजोर हुई, तो तेजस्वी के लिए आरजेडी को संभालना आसान नहीं होने वाला।

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