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पूर्वांचल में जापानी बुखार का प्रकोप क्या वाक़ई कम हो गया है? सरकारी दावों की हक़ीक़त: गोरखपुर से ग्राउंड रिपोर्ट

अगस्त महीने का आख़िरी सप्ताह चल रहा है. गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के 100 नंबर वॉर्ड के बाहर दर्जनों की संख्या में लोग अपने बच्चों को भर्ती कराने की कोशिश में हैं. कुछ लोगों के बच्चे कई दिनों से भर्ती भी हैं. ज़्यादातर बच्चों को तेज़ बुख़ार के साथ झटके भी आते हैं जो कि जापानी इंसेफ़ेलाइटिस का प्रमुख लक्षण है.

दोपहर के क़रीब दो बजे महराजगंज ज़िले से आए दिलदार अली अपने तीन साल के बेटे को एंबुलेंस से उतार रहे थे. पूछने पर बताने लगे, "तीन चार दिन से बुख़ार आ रहा था. झटके भी आ रहे थे. ज़िला अस्पताल में दिखा रहे थे लेकिन डॉक्टर बोले कि बीआरडी ले जाओ, यहां इलाज नहीं हो पाएगा."

reality of government claims that outbreak of Japanese fever subsided in Purvanchal

देवरिया से राम राज अपनी अपने नाती यानी बेटी के बेटे को लेकर पिछले 28 दिन से गोरखपुर में हैं. मेडिकल कॉलेज में चार वर्षीय बच्चे का इलाज चल रहा है. व्यवस्था से बेहद नाराज़ हैं. कहते हैं, "बुख़ार के साथ झटके आ रहे थे. देवरिया में इलाज नहीं हुआ. यहां आए हुए 28 दिन हो गए हैं, कुछ पता नहीं चल रहा है कि उसे क्या हुआ है और उसका क्या इलाज चल रहा है. जिससे पूछो तो एक-दूसरे पर टालने लगता है."

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पिछले हफ़्ते अख़बारों में यह ख़बर भी छपी कि कुशीनगर ज़िले के एक ही गांव में बड़ी संख्या में बच्चे इंसेफ़ेलाइटिस से पीड़ित हैं जिनमें तीन बच्चों की मौत भी हो चुकी है. अख़बारों में यह ख़बर भी छपी थी कि इंसेफ़ेलाइटिस के टीके भी ख़त्म हो गए हैं और टीकाकरण का काम रुका हुआ है. हालांकि उसी दिन गोरखपुर के अतिरिक्त स्वास्थ्य निदेशक डॉक्टर रमेश गोयल ने बीबीसी को बताया कि टीके की कमी हुई ज़रूर थी, लेकिन अब कोई कमी नहीं है और टीकाकरण हो रहा है.

गोरखपुर और उससे लगे पूर्वांचल के कई ज़िलों में जुलाई से लेकर अक्टूबर तक यानी मॉनसून के मौसम में जापानी इंसेफ़ेलाइटिस का प्रकोप दशकों से यहां के बच्चों की जान ले रहा है. हर साल सैकड़ों की संख्या में बच्चे इस बीमारी से पीड़ित होते हैं और बड़ी संख्या में बच्चों की मौत भी होती है.

लेकिन राज्य सरकार का दावा है कि पिछले चार साल में इस बीमारी पर लगभग नियंत्रण पाया जा चुका है. दावा तो यह भी किया जा रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में इस इसका पूरी तरह से उन्मूलन कर लिया जाएगा.

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कई स्तर पर रणनीति में बदलाव

गोरखपुर मंडल के अतिरिक्त स्वास्थ्य निदेशक डॉक्टर रमेश गोयल बीमारी में आई कमी की वजह बताते हैं, "माननीय मुख्यमंत्री जी के निर्देश में कई स्तरों पर जो रणनीति अपनाई गई, उसके कारगर परिणाम अब दिख रहे हैं. पिछले तीन साल में जापानी इंसेफ़ेलाइटिस के मरीजों की संख्या काफ़ी कम रही. इस बार कुछ बढ़ोत्तरी दिख रही है लेकिन मृत्यु दर में काफ़ी कमी आई है. इसकी सबसे बड़ी वजह दस्तक जैसे जागरुकता कार्यक्रम के अलावा ब्लॉक स्तर के सरकारी अस्पतालों में ईटीसी यानी इंसेफ़ेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर बनाना और ज़िला चिकित्सालयों को भी इंसेफ़ेलाइटिस से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए साधन संपन्न बनाना है."

डॉक्टर रमेश गोयल कहते हैं कि यदि किसी बच्चे को इंसेफ़ेलाइटिस हो जाए तो उसे जितनी जल्दी इलाज मिल जाएगा, उसके बचने की संभावना उतनी ज़्यादा रहती है. अभी तक गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ही इंसेफ़ेलाइटिस के इलाज की सुविधाएं थीं और मेडिकल कॉलेज का 100 नंबर वॉर्ड ख़ासतौर से इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए ही बनाया गया है.

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर गणेश कुमार कहते हैं कि ब्लॉक और ज़िला स्तर पर भी इलाज की सुविधा हो जाने की वजह से मेडिकल कॉलेज के अस्पताल पर दबाव कम हुआ है.

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर गणेश कुमार कहते हैं, "पहले एक ही बेड पर दो-दो तीन-तीन बच्चे भर्ती रहते थे. लेकिन दूसरे अस्पतालों में भी सुविधा होने के कारण लोड कम हुआ है. अब यहां पर सिर्फ़ गंभीर बच्चे ही आते हैं."

क्यों होती है बीमारी?

पूर्वांचल में गोरखपुर-बस्ती मंडलों के सात ज़िलों के अलावा बिहार और नेपाल के तराई इलाक़ों में मॉनसून के बाद जल-जमाव और अन्य वजहों से मच्छरों के पनपने के कारण बड़ी संख्या में इंसेफ़ेलाइटिस की बीमारी बच्चों को अपनी चपेट में लेती है. आमतौर पर इसे दिमाग़ी बुख़ार भी कहा जाता है क्योंकि इसकी वजह से तेज़ बुख़ार के साथ बच्चों में झटके आना यानी मतिभ्रम की स्थिति आ जाती है.

पहले माना जाता था कि दिमाग़ी बुख़ार जापानी इंसेफ़ेलाइटिस वायरस की वजह से होते हैं, जो मच्छरों से फैलता है. लेकिन बाद की जांच से पता चला कि इनमें से सिर्फ़ 13 प्रतिशत मामले जापानी इंसेफ़ेलाइटिस की वजह से थे. इसीलिए इस तरह के लक्षणों वाले मरीजों को एईएस यानी एक्यूट इंसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम नाम के बीमारी के एक समूह के तहत रख दिया गया. एईएस की बीमारियां कुओं के गंदे पानी और हैंडपंप के पानी पीने की वजह से भी फैलती हैं. गंदगी तो प्रमुख वजह है ही.

पूर्वांचल में यह बीमारी यूं तो सत्तर और अस्सी के दशक से ही बच्चों को अपनी चपेट में ले रही है, लेकिन साल 2005 के बाद बीमार बच्चों की संख्या और इसकी वजह से होने वाली मौतों में भी काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई. उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से लोकसभा सदस्य रहते हुए साल 1998 से ही इस मुद्दे को संसद में उठा रहे हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने योजनाबद्ध तरीक़े से इसके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने की शुरुआत की.

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क्या हालात बेहतर हुए हैं?

सरकारी आंकड़ों की मानें तो इसके सार्थक परिणाम भी दिखे हैं. अकेले गोरखपुर में साल 2017 में इस बीमारी से ग्रस्त बच्चों की संख्या जहां 2864 थी, वहीं साल 2021 में यह संख्या महज़ 428 रह गई है. सरकारी आंकड़ों में गोरखपुर में इस साल अब तक 17 बच्चों की मौत हुई है. अन्य ज़िलों में भी बीमार बच्चों और मृतक संख्या में कमी का दावा किया गया है.

सरकारी आंकड़ों में यह गिरावट पिछले चार साल से लगातार देखी गई है. साल 2018 में इस बीमारी से 1242 बच्चे, साल 2019 में 931 बच्चे और साल 2020 में 913 बच्चे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुए थे.

लेकिन इन आंकड़ों पर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के ही एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आंकड़ों को दबाने और कम से कम दिखाने की हर संभव कोशिश हो रही है.

उनके मुताबिक, "ब्लॉक लेवल पर ईटीसी यानी इंसेफ़ेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर इलाज के लिए बनाए गए हैं, लेकिन वहां पर इलाज और टेस्टिंग की सुविधाएं नहीं हैं. वहां के डॉक्टरों और अन्य स्टाफ़ पर दबाव है कि उन्हें बीआरडी मेडिकल कॉलेज न भेजा जाए. बीआरडी मेडिकल कॉलेज यदि भेजा भी जा रहा है तो यहां 100 नंबर वॉर्ड में भर्ती न करके अन्य वॉर्डों में शिफ़्ट किया जा रहा है. यही नहीं, बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भी अब बच्चों को एईएस/ जेई नाम से एडमिट करने की बजाय एएफ़आई यानी एक्यूट फ़िब्राइल इलनेस नामक बीमारी के नाम से दर्ज किया जा रहा है जबकि साल 2018 से पहले इस नाम से किसी बीमारी को वर्गीकृत नहीं किया गया था."

अतिरिक्त स्वास्थ्य निदेश डॉक्टर रमेश गोयल ने हमें इंसेफ़ेलाइटिस के आंकड़े बताए ज़रूर, लेकिन जब हमने उनसे इन आंकड़ों का प्रिंट आउट मांगा तो उन्होंने साफ़तौर पर मना कर दिया. उनका कहना था कि इन आंकड़ों को देने के लिए वो सक्षम अधिकारी नहीं हैं.

आंकड़ों में गड़बड़ी का आरोप

इंसेफ़ेलाइटिस से होने वाली मौतों की यदि बात की जाए तो बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक इंसेंटिव केयर यूनिट यानी PICU में साल 2019 में जनवरी से दिसंबर के बीच 1022 बच्चों की मौत हुई थी. यहां उन्हीं बच्चों को भर्ती किया जाता है जो एईएस/ जेई बीमारी से पीड़ित होते हैं. साल 2019 में 1500 से ज़्यादा बच्चों के सैंपल आईसीएमआर में भेजे गए थे. आईसीएमआर में संक्रमित बच्चों का सैंपल इसलिए भेजा जाता है ताकि पता चल सके कि वास्तव में इनमें संक्रमण किस स्तर का है. बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पिछले दो साल से आईसीएमआर में भेजे जाने वाले सैंपल्स का कोई विवरण नहीं है.

इंसेफ़ेलाइटिस को एएफ़आई नाम से वर्गीकृत करने की वजह यह बताया जा रहा है कि इससे सामान्य बुख़ार से पीड़ित बच्चों का पहले सामान्य वॉर्ड में इलाज किया जाता है ताकि इंसेफ़ेलाइटिस वॉर्ड में भीड़ न बढ़े. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि गोरखपुर के अलावा किसी अन्य अस्पताल में इस नाम से किसी बच्चे को भर्ती नहीं किया जा रहा है.

महराजगंज के एक सरकारी अस्पताल के डॉक्टर तो यह नाम सुनकर पहले हँस पड़े, फिर कहने लगे, "जब अलग-अलग किया जाएगा, तभी तो संख्या कम आएगी. पहले भी यदि एईएस और जेई को अलग-अलग करके देखते तो सारे बच्चे जेई से ही पीड़ित नहीं थे और न ही मरने वाले सारे बच्चे जेई यानी जापानी इंसेफ़ेलाइटिस से मर रहे थे. जब तक जांच में पता चलता कि जेई है या नहीं, कई बच्चे तो उससे पहले ही दम तोड़ देते थे."

साल 2020 में लॉकडाउन की वजह से भी बहुत से मरीज़ बीआरडी मेडिकल कॉलेज नहीं आ सके थे. नेपाल और बिहार के दूर-दराज़ के इलाक़ों के ज़्यादातर मरीज़ अभी भी नहीं आ पा रहे हैं. जानकारों के मुताबिक, पिछले दो साल से मरीज़ों की संख्या में कमी की एक वजह यह भी है.

ख़ुद डॉक्टर रमेश गोयल कहते हैं, "जापानी इंसेफ़ेलाइटिस का एक ट्रेंड यह भी देखा गया है कि हर चार-पांच साल पर इसका एक पीक आता है जब संख्या अचानक बहुत बढ़ जाती है. साल 2017 में पीक था और इस बार भी ऐसा लग रहा है कि पीक आएगा क्योंकि संख्या लगातार बढ़ रही है. इस बार बारिश भी ज़्यादा हुई है. लेकिन संतोष की बात यह है कि जो हमारे प्रयास हैं, उनकी वजह से मृत्यु दर में काफ़ी कमी आई है और उम्मीद है कि आगे भी ऐसा ही रहेगा."

आस पड़ोस के ज़िलों का हाल

गोरखपुर के अलावा महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, संतकबीर नगर, बस्ती इत्यादि ज़िलों में पिछले कुछ समय से तेज़ बुख़ार से पीड़ित बच्चों की भरमार है. कई बच्चों की मौत भी हो चुकी है. एक हफ़्ते पहले ही कुशीनगर के एक गांव रामपुर जंगल में एक महीने के भीतर तीन बच्चों की जापानी इंसेफ़ेलाइटिस से मौत हो गई. यहां दर्जनों बच्चे तेज़ बुख़ार और खांसी से पीड़ित हैं जिनमें ज़्यादातर में वही लक्षण हैं जो जापानी इंसेफ़ेलाइटिस में होते हैं.

बीआरडी मेडिकल कॉलेज से लेकर गांवों तक में तेज़ बुख़ार वाले बच्चों की भरमार है. बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर गणेश कुमार कहते हैं कि अस्पताल में बेड की कोई कमी नहीं है और बेड खाली पड़े हैं, लेकिन बीबीसी की टीम जब बीआरडी मेडिकल कॉलेज के 100 नंबर वॉर्ड पहुंची तो वहां NICU वॉर्ड और PICU वॉर्ड, दोनों जगह कोई बेड खाली नहीं था, बल्कि एक-एक बेड पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे भर्ती थे. यही स्थिति साल 2017 से पहले भी इन वॉर्डों में हुआ करती थी.

NICU वॉर्ड में नवजात शिशु भर्ती किए जाते हैं जबकि PICU वॉर्ड में एईएस/ जेई से पीड़ित बच्चों का इलाज किया जाता है. NICU वॉर्ड की तस्वीर लेने या वीडियोग्राफ़ी करने से किसी ने मना नहीं किया लेकिन जैसे ही PICU वॉर्ड में तस्वीर ख़ींचने लगे, वहां मौजूद कर्मचारियों ने ऐसा करने से मना कर दिया. उस कर्मचारी का कहना था कि पहले वॉर्ड की इंचार्ज डॉक्टर अनिता मेहता से इजाज़त लीजिए. जब हमने अनिता मेहता से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि 'प्रिंसिपल साहब से इसकी अनुमति लीजिए'. प्रिंसिपल डॉक्टर गणेश कुमार का कहना था, "इस वॉर्ड की वीडियोग्राफ़ी के लिए डायरेक्टर जनरल या फिर चीफ़ मिनिस्टर से ही परमिशन लेनी पड़ेगी. उसके बग़ैर हम वीडियोग्राफ़ी की अनुमति नहीं दे सकते हैं."

सवाल उठता है कि PICU वॉर्ड की वीडियोग्राफ़ी और इंसेफ़ेलाइटिस से जुड़े आंकड़ों को देने से मनाही क्यों की जा रही है?

गोरखपुर में मशहूर बाल रोग विशेषज्ञ के डॉक्टर आरएन सिंह लंबे समय तक इंसेफ़ेलाइटिस के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ते रहे. उनका दावा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संसद में जिन सवालों को बीमारी के निदानों के साथ उठाते थे, उसकी सलाह उन्हें डॉक्टर आरएन सिंह ही देते थे. यही नहीं, इंसेफ़ेलाइटिस को रोकने के लिए योगी आदित्यनाथ ने बतौर मुख्यमंत्री जो कार्ययोजना तैयार की है, उनमें भी ज़्यादातर वही बातें हैं जिनका सुझाव डॉक्टर आरएन सिंह पिछले कई साल से देते रहे हैं.

सरकारी दावों पर सवाल

डॉक्टर आरएन सिंह यह तो मानते हैं कि साल 2017 के बाद इंसेफ़ेलाइटिस उन्मूलन की दिशा में कई सार्थक काम किए गए हैं और उनका असर भी दिख रहा है, लेकिन वो आंकड़ों की बाज़ीगरी से भी इनकार नहीं करते हैं.

डॉक्टर आरएन सिंह कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ ने न सिर्फ़ इस महामारी को भली-भांति देखा है, बल्कि सांसद रहते हुए एक एक्टिविस्ट की तरह उन्होंने काम भी किया है. संसद में इस सवाल को उठाते रहे हैं. यही वजह है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस दिशा में काफ़ी काम किया और ख़ुद गोरखपुर आने पर इसकी मॉनिटरिंग करते हैं. लेकिन अस्पतालों के डीसेंट्रलाइज़ेशन और बीमारी को अन्य नाम देकर आंकड़ों में हेर-फेर से भी इनकार नहीं किया जा सकता है. पर यह बात तो स्वीकार करनी पड़ेगी कि बीमारी पर काफ़ी हद तक नियंत्रण पाया गया है."

डॉक्टर आरएन सिंह कहते हैं कि इंसेफ़ेलाइटिस को रोकने के पहले भी बहुत प्रयास हुए हैं, लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें धरातल पर नहीं उतारा जा सका. वो कहते हैं, "साल 2005 में सिर्फ़ एक फ़ैक्स पर यूपीए सरकार ने हेलीकॉप्टर भेज दिया था. पहली बार लाखों की संख्या में टीके लग गए थे, लेकिन किन्हीं वजहों से यह फिर उभर आया."

डॉक्टर आरएन सिंह कहते हैं कि इंसेफ़ेलाइटिस पर तमाम प्रयासों से नियंत्रण भले ही कर लिया जाए, लेकिन इसका उन्मूलन तभी हो सकता है जब इसके लिए बना राष्ट्रीय प्रोग्राम लागू कर दिया जाए.

उन्होंने कहा, "हमारी शुरू से मांग थी कि इंसेफ़ेलाइटिस उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय प्रोग्राम बनाया जाए क्योंकि ये बीमारी सिर्फ़ पूर्वांचल में ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों में भी है. यूपीए सरकार ने मार्च 2013 में राष्ट्रीय प्रोग्राम बना भी दिया है, लेकिन वो अब तक लागू नहीं हो सका है."

"यदि उस प्रोग्राम को लागू कर दिया जाता है तो पोलियो, टीबी और ऐसी ही अन्य संक्रामक बीमारियों की तरह इंसेफ़ेलाइटिस का भी उन्मूलन किया जा सकता है क्योंकि राष्ट्रीय प्रोग्राम होने पर इसके लिए कोई एक एजेंसी और एक अधिकारी की ज़िम्मेदारी होगी. यदि राष्ट्रीय प्रोग्राम नहीं बना तो इंसेफ़ेलाइटिस कभी यूपी में कभी बिहार में, कभी आसाम में, तो कभी किसी अन्य राज्य में फिर से इस बीमारी का आगमन हो सकता है. यह धमकी नहीं दे रहा हूं बल्कि सचेत कर रहा हूं."

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आख़िर ये जापानी बुख़ार क्या बला है?

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