2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी में 20 प्रतिशत तक गिरावट के आसार: रिपोर्ट

नई दिल्ली। भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वित्त वर्ष 2020-21 के पहले क्वार्टर यानी अप्रैल-जून तिमाही में 18-20 प्रतिशत तक संकुचन हो सकता है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशिल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल) ने अपनी एक रिपोर्ट में ये अनुमान जाहिर किया है। वहीं जुलाई में जीडीपी 5 प्रतिशत सिकुड़ सकती है। जीडीपी पर ये कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के प्रभाव का असर माना जा रहा है।

लॉकडाउन के चलते नहीं मिल रही निरंतरता

लॉकडाउन के चलते नहीं मिल रही निरंतरता

रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक गतिविधियां इस महीने और अगले महीने यानी अगस्त सितंबर में तेज हो जाएंगी। जिसके बाद ये त्योहारी सीजन के खत्म होने तक चलती रहेंगी। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कोरोना वायरस का खतरा अभी बरकरार है और लॉकडाउन भी देश के कई हिस्सों में अलग-अलग रूपों में अभी भी है। ऐसे में मजबूत जीडीपी ग्रोथ में निरंतरता नहीं बन पा रही है।

कृषि सेक्टर से राहत की खबर

कृषि सेक्टर से राहत की खबर

लॉकडाउन और महामारी के बावजूद कृषि सेक्टर से अच्छी रिपोर्ट मिली है। खेती में नौ वर्षों में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। सेवा क्षेत्र में भी जून 2020 में बेहतरी दिखी है लेकिन इस्पात उत्पादन में 33 प्रतिशत की गिरावट और विनिर्माण क्षेत्र में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। वहीं बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट कहती है कि आने वाले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी में 7.5 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है।

मनमोहन सिंह ने भी अर्थव्यवस्था के लिए बताया चुनौतीपूर्ण समय

मनमोहन सिंह ने भी अर्थव्यवस्था के लिए बताया चुनौतीपूर्ण समय

अर्थव्यवस्था को लेकर लगातार कई एजेंसियां अपने अनुमान जाहिर कर रही हैं। दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी एक दिन पहले ही कोरोना संकट के बीच अर्थव्यवस्था को लेकर लेख लिखा है। डॉ सिंह ने अपने लेख में कहा है कि हमारे देश और दुनिया के लिए असाधारण कठिन समय हैं। कोविड-19 से लोग बीमारी और मौत के भय के चपेट में हैं। लोगों में इस तरह की चिंता की भावना समाज के कामकाज में जबरदस्त उथल-पुथल पैदा कर सकती है। नतीजतन सामान्य सामाजिक व्यवस्था में उथल-पुथल से आजीविका और बड़ी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। हमारे समाज के कमजोर वर्गों की एक बड़ी संख्या गरीबी में लौट सकती है, यह एक विकासशील देश के लिए दुर्लभ घटना है। कई उद्योग बंद हो सकते हैं। गंभीर बेरोजगारी के कारण एक पूरी पीढ़ी खत्म हो सकती है। संकुचित अर्थव्यवस्था के चलते वित्तीय संसाधनों में कमी के कारण अपने बच्चों को खिलाने और पढ़ाने की हमारी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। आर्थिक संकुचन का घातक प्रभाव लंबा और गहरा है, खासकर गरीबों पर। इस प्रकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लाने के लिए पूरी ताकत के साथ काम करना अत्यावश्यक है।

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