Rana Sanga Jayanti: शरीर पर 80 घाव, 100 युद्धों में लिया भाग, एक हाथ और आंख नहीं, जानें कौन थे राणा सांगा?
Rana Sanga Jayanti 2025: राणा सांगा भारतीय इतिहास के महान योद्धा थे। उनको लेकर पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक गरियारे में चर्चा काफी तेज है। आज शनिवार(12 अप्रैल) को राणा सांगा की जयंती पूरे देश में और खासकर राजस्थान में काफी उत्साह से मनाई जा रही है। इस मौके पर हम जानेंगे कि आखिर राणा सांगा कौन थे? भारतीय इतिहास में उनका क्या योगदान है? और आखिर इस महान योद्धा को लेकर राजनीतिक पारा इतना हाई क्यों है?
महान योद्धा राणा सांगा के बारे में सपा सांसद रामजी लाल सुमन के विवादित बयान ने पूरे देश में हंगामा खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान बाबर के औलाद हैं तो तुमलोग उस गद्दार राणा सांगा के औलाद हो। इसपर करणी सेना ने उनके घर पर हमला किया था। सोशल मीडिया पर इस बयान की लोगों ने काफी आलोचना की। बीजेपी नेताओं ने भी जमकर हंगामा बोला। इस बयान पर उन्होंने एक मीडिया चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा कि उनका मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का नहीं था।

राणा सांगा के बारे में हमारे देश में बीते कुछ दिनों से लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे में हम उनके जयंती के अवसर पर आपको उनके बारे में ऐसी बाते बताएंगे जिससे शायद आप भी अंजान होंगे। 'हिंदूपत' की उपाधि से सम्मानित इस योद्धा की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। शरीर पर 80 से अधिक गहरे घाव होने के बावजूद भी वो मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहें। इनके जन्म जयंती पर देश के विभिन्न राजनेताओं ने उनके शौर्य को याद किया है।
सीएम योगी ने किया पोस्ट
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा- धर्मरक्षा हेतु समर्पित रहे परम प्रतापी राणा सांगा जी की जयंती पर उन्हें कोटिश: नमन! राष्ट्रभक्ति और त्याग की प्रतीक उनकी यशगाथा इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। उनका शौर्य युगों-युगों तक भारतभूमि को स्वाभिमान से सिंचित करता रहेगा।
राणा सांगा कौन थे?
राणा सांगा, जिनका मूल नाम महाराणा संग्राम सिंह था, 16वीं शताब्दी के एक महान राजपूत शासक थे। वे मेवाड़ के सिसोदिया वंश से संबंधित थे। वो वीरता, संगठन क्षमता तथा हिंदू एकता के प्रतीक माने जाते हैं। राणा सांगा का जन्म 1482 में हुआ था। वे राणा रायमल के पुत्र थे। अपने शासनकाल के दौरान, उन्होंने मेवाड़ को एक शक्तिशाली राज्य में परिवर्तित किया और राजपूतों को एकजुट करने का प्रयास किया।
80 घाव वाली कहानी की घटना क्या है?
80 घाव वाली कहानी" राणा सांगा की वीरता और अदम्य साहस का प्रतीक है। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि इतिहास में दर्ज वो हकीकत है जो उन्हें "भारत का सबसे जख्मी लेकिन अडिग योद्धा" बनाती है। राणा सांगा का जीवन निरंतर युद्धों में बीता। उन्होंने अफगानों, तुर्कों, दिल्ली सल्तनत और मालवा-गुजरात के सुल्तानों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं। इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने लगभग 100 युद्धों में भाग लिया।
"मैंने ऐसा वीर कभी नहीं देखा, जो इतनी चोटें खाकर भी युद्ध भूमि में टिका रहा।"
इन युद्धों के दौरान उनके शरीर पर 80 से अधिक गहरे घाव हो चुके थे। एक हाथ कट गया था - लेकिन उन्होंने युद्ध करना नहीं छोड़ा। एक आंख चली गई थी - फिर भी वे रणभूमि में डटकर लड़े। कई हड्डियाँ टूटी थीं, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा। 1527 के खानवा युद्ध के बाद, बाबर ने अपने संस्मरणों (तुजुक-ए-बाबरी) में राणा सांगा की वीरता का जिक्र किया और कहा कि:"मैंने ऐसा वीर कभी नहीं देखा, जो इतनी चोटें खाकर भी युद्ध भूमि में टिका रहा।" जब राजस्थान या भारत में वीरता की मिसाल दी जाती है, तो "राणा सांगा के 80 घावों" की कहानी प्रेरणा का स्रोत मानी जाती है।
राणा सांगा का भारतीय इतिहास में योगदान
राणा सांगा ने बिखरे हुए राजपूत राज्यों को एकजुट किया। उन्होंने एक राजपूत महासंघ का निर्माण किया, जिसमें मारवाड़, आमेर, बूंदी, धौलपुर जैसे कई राज्यों ने उनका साथ दिया। यह प्रयास भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू शक्तियों की एकता की दिशा में एक बड़ा कदम था।
विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ संघर्ष
राणा सांगा ने दिल्ली सल्तनत (इब्राहीम लोदी), मालवा, और गुजरात सुल्तनत के खिलाफ कई सफल अभियान चलाए। उनका सबसे प्रसिद्ध युद्ध बाबर के खिलाफ 1527 में खानवा के मैदान में लड़ा गया। भले ही यह युद्ध वे हार गए, लेकिन उनकी वीरता ने बाबर तक को चकित कर दिया। वे स्वराज की भावना के प्रतीक थे। उनका उद्देश्य भारत से तुर्क और मुगलों जैसी विदेशी शक्तियों को हटाकर देशी राजाओं द्वारा भारत का संचालन।
बलिदान और वीरता का प्रतीक
उन्होंने अपने शरीर पर 80 से अधिक घाव सहन किए। एक हाथ और एक आंख खोने के बावजूद वे युद्धभूमि में डटे रहे। यह भारतीय इतिहास में बलिदान और शौर्य की चरम सीमा मानी जाती है। राणा सांगा के शासनकाल में मेवाड़ एक सैन्य और राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा। उनका दरबार विद्वानों, योद्धाओं और रणनीतिक सलाहकारों से भरा रहता था, जो उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण है।
हिंदूपत की उपाधि
उन्हें "हिंदूपत" की उपाधि दी गई थी, जिसका अर्थ है "हिंदुओं का संरक्षक और राजा"। यह उपाधि केवल वीरता नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक नेतृत्व का भी प्रतीक थी।












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