रामजस के प्रिंसिपल ने कहा- 'जब कॉलेज में दिक्कत होती है, तो दुःख होता है'

रामजस कॉलेज के प्रधानाचार्य का कहना है कि वो सेवानिवृत्त होने के बाद कॉलेज से सिर्फ इतना चाहते हैं कि कॉलेज की शांति बनी रहे।

नई दिल्ली। साल 1985 में जब दिल्ली विश्वविद्यालय का रामजस कॉलेज तब राजेंद्र प्रसाद प्रधानाचार्य का पद संभाला था। अपने स्थापना के बाद से अब तक कॉलेज 14 प्रधानाचार्य देख चुका है। आज राजेंद्र प्रसाद सेवानिवृत्त हो जाएंगे। हालांकि फिलहाल रामजस कॉलेज में भय और विवाद का माहौल है।

रामजस के प्रिंसिपल ने कहा- 'जब कॉलेज में दिक्कत होती है, तो दुःख होता है'

राजेंद्र प्रसाद करते हैं कि जब कभी भी रामजस में कोई दिक्कत होती है, तो मुझे दुख होता है क्योंकि मैंने 32 साल से अपना खून पसीना और आंसू इस कॉलेज में लगाए हैं। मैं सेवानिवृत्त हो जाउंगा। मुझे कॉलेज से वापस कुछ नहीं चाहिए सिवाय कॉलेज की शांति और उसके उज्ज्वल भविष्य के।

राजेंद्र, कॉलेज में सबसे लंबे समय तक रहने वाले प्राधानाचार्य है। अपने 32 साल के समय में उन्होंने प्रभावी तरीके से कॉलेज में हिंसा और अनुशासनहीता को खत्म करने का प्रयास किया और रामजस को अन्य कॉलेजों के बराबरी में खड़ा करने का काम किया।

दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए ऑनर्स इन हिस्ट्री की पढ़ाई के मामले में यह कॉलेज सबसे अच्छा माने जाने वाले इस कॉलेज में पहली बार राजेंद्र 5 साल की उम्र में आए थे। उस वक्त इनके पिता इतिहास विभाग में पढ़ाते थे।

राजेंद्र ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़ाई की और 22 साल की उम्र में दिल्ली कॉलेज में पढ़ाने लगे। बाद में इस कॉलेज का नाम जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज हो गया और वो यहां इतिहास विभाग में पढ़ाने लगे।

राजेंद्र ने बताया कि साल 1985 में एक दिन जब मैं 33 साल का था, वाइस चांसलर मूनिस रज़ा मेरे पास आए और मुझसे तैयार होने को कहा। मैं चौंक गया कि ऐसी क्या इमरजेंसी है लेकिन उन्होंने कहा कि मैं तैयार हो कर उनके साथ चलूं। वो मुझे कॉलेज के गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष के पास ले गए और कहा कि तुम्हें ज्वाइन करना है। मैं बुरी तरह से चौंक गया।

राजेंद्र ने प्रधानाचार्य उस वक्त बने थे जब कॉलेज अशांत दौर से गुजर रहा था। अनुशासन की कमी, बुरी तरह से बनाए गए खाते और कॉलेज की ख्याति उनके लिए मुख्य चिंता थी। लेकिन उन्होंने सभी चुनौतियों का सामना किया। राजेंद्र ने कहा कि मुझे कई उम्दा लोगों की सहायता मिली। मैंन उन सभी लोगों से सीखा। राजेंद्र ने कहा कि द्ल्ली विश्वविद्यालय का एकेडमि कल्चर और वातावरण बीते कुछ सालों में धूमिल हुआ है।

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