Rajasthan Assembly Session:भाजपा की हार पक्की, फिर अविश्वास प्रस्ताव पर क्यों अड़ी ?

नई दिल्ली- राजस्थान में कांग्रेस अपने 19 बागी विधायकों के साथ 'युद्ध विराम' की घोषणा कर चुकी है। अशोक गहलोत को अब उनके लिए 'निकम्मे-नकारे' रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ काम करने में कोई ऐतराज नहीं रह गया है। यानि राजस्थान में गहलोत सरकार फिलहाल सुरक्षित है। कर्नाटक और मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी सत्ता गंवाने जैसा भय कम से कम फिलहाल के लिए कांग्रेस आलाकमान के दिमाग से दूर हो चुका है। लेकिन, कमाल की बात है कि कांग्रेस पर आए संकट के दौरान अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा तक नहीं करने वाली विपक्षी बीजेपी ने अचानक रणनीति क्यों बदल ली है? जब उसे पता है कि अब सरकार के पास बहुमत से कहीं ज्यादा विधायकों का समर्थन है और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विश्वास मत हासिल करना चाहते हैं तो फिर बीजेपी ने अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने का फैसला क्यों किया है?

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    भाजपा ने राजस्थान में बदली रणनीति

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    भाजपा नेताओं को पता है कि इस समय उसका अविश्वास प्रस्ताव राजस्थान विधानसभा में औंधे मुंह गिर सकता है। लेकिन, जैसे ही कांग्रेस खेमे में सबकुछ ठीक होने की घोषणा की गई कि उसने अपनी 'रणनीति पर दूसरी तरह से विचार' करना शुरू कर दिया। मंगलवार को पार्टी ने जो बैठक बुलाई थी, उसे भी रद्द कर दिया गया। जो बैठक मंगलवार होने वाली थी, वह गुरुवार को हुई, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत प्रदेश भाजपा के सारे बड़े नेता शामिल हुए। कांग्रेस में पायलट खेमे से 'युद्ध विराम' की कांग्रेसी घोषणा के तीसरे दिन बीजेपी ने एक चौंकाने वाली घोषणा करते हुए कहा कि वह गहलोत सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएगी।

    कांग्रेस के पास बहुमत से कहीं ज्यादा है आंकड़ा

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    राजस्थान विधानसभा में पायलट की वापसी के बाद कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या फिर से 107 (बसपा से पार्टी में आए सभी 6 विधायकों समेत) हो चुकी है। सभी 13 निर्दलीय विधायक भी अब फिर से सरकार के साथ हो चुके हैं। बाकी छोटे दलों को मिलाकर 200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में सरकार को 125 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जबकि बहुमत के आंकड़े के लिए सिर्फ 101 का ही समर्थन जरूरी है। विपक्षी भाजपा के पास सहयोगी पार्टी के 3 विधायकों के साथ आंकड़ा सिर्फ 75 पर अटक जाता है। ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव के गिरने की गारंटी पर कोई सवाल नहीं रह जाता है।

    भाजपा की हार पक्की, फिर अविश्वास प्रस्ताव पर अड़ी

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    दरअसल, अविश्वास प्रस्ताव लाने के पीछे भाजपा की मंशा सरकार गिराने के लिए जरूरी विधायकों को जुटा लेने की उम्मीद के भरोसे पर नहीं है। ऐसा होता तो वह तभी इसकी मांग करती, जब 19 कांग्रेसी विधायकों ने एक महीने तक बगावत का झंडा बुलंद कर रखा था। विपक्ष को यकीन है कि सदन में उसका अविश्वास प्रस्ताव गिरना तय है, लेकिन वह सिर्फ ये चाहती है कि इसके जरिए सदन में राज्य से जुड़े आवश्यक मुद्दों पर बहस कराकर अशोक गहलोत सरकार को घेरा जाए। मसलन, पिछले एक महीने से गहलोत अपनी सरकार बचाने में जुटे हुए हैं और भाजपा के रणनीतिकारों को लगता है कि यह अच्छा मौका है, जब कोरोना वायरस जैसे संकट पर सरकार की कमजोरियों का पर्दाफाश किया जा सकता है। यही नहीं, पार्टी को यह भी उम्मीद है कि भले ही कांग्रेस में फिलहाल गहलोत और पायलट खेमें में समझौता हुआ है, लेकिन अंदर ही अंदर एक दरार पड़ गई है, जो किसी भी समय ना भरपाने वाली खाई में तब्दील हो सकती है।

    ध्वनि मत से विश्वास प्रस्ताव पास करा सकते हैं गहलोत

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    यही वजह है कि जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी सरकार को सियासी लफड़ों से कम से कम 6 महीने के लिए मुक्त कराने के मकसद से विश्वास प्रस्ताव लाने की बात की तो भाजपा ने तपाक से अविश्वास प्रस्ताव का तीर चल दिया। राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा है, 'हमने उनके विश्वास प्रस्ताव का जवाब अविश्वास प्रस्ताव से दिया है।' वैसे जानकारी के मुताबिक मुख्मयंत्री के विश्वास प्रस्ताव को दूसरे प्रस्तावों पर तबज्जों मिल सकता है। बीजेपी को आशंका है कि ऐसा होने पर गहलोत सरकार विश्वास प्रस्ताव को ध्वनि मत से पास कराने की कोशिश कर सकती है और ऐसा होने पर बड़े मुद्दों पर बहस के मौके से वह चूक सकती है।

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