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इसलिए रेल बजट और आम बजट एक साथ पेश नहीं किया जाता

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नई दिल्ली। रेल बजट पेश होने के बााद आपने योजनाओं का पिटारा तो देखा पर क्या आपके मन में आया कि आम बजट और रेल बजट को अलग-अलग पेश करने की जरूरत क्याें पड़ती है।

दरअसल जब इतिहास आधुनिकता की अंगड़ाई ले रहा था तब रेलवे और आम बजट पर चिंताएं शुरु हाे गईं थीं। साल 1921 में ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के अध्यक्ष सर विलियम एक्वर्थ ने यह देखा कि पूरे रेलवे सिस्टम को एक बेहतर प्रबंधन की दिशा में ले जाने की ज़रूरत है। साल 1924 में उन्होंने आम बजट से रेल बजट को अलग करने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद से अलग बजट व्यवस्था की नींव रखी गई।

पढ़ें- रेल बजट की अनोखी सुविधाएं

साल 1924 पर आएं तो पूरे देश के बजट में रेल बजट की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत थी। देश के बजट में रेल बजट की इतनी अधिक हिस्सेदारी देखकर रेल बजट को आम बजट से अलग करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया।

उस दौर से लेकर अब तक रेल बजट को आम बजट से अलग पेश किया जाता है। जब रेल बजट को आम बजट से अलग किया गया था, उस समय रेलवे का प्रयोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट में 75 फीसदी और माल ढुलाई में 90 फीसदी तक होता था। हालांकि आज की स्थत‍ि है कि ट्रांस्पोर्ट में ट्रेकों का शेयर बढ़ रहा है व ट्रेनों का लगातार घटा है।

आज के रेल बजट में कुछ सुविधाएं पुरानी हैं तो कुछ नईं। इसी के साथ जनता की भी कई उम्मीदें पिछले बजट से जुड़ी हैं तो कुछ नरेंद्र मोदी की 'लहर' से। किस तरह से बजट में शामिल योजनाओं का क्रियान्वयन होगा, यह जवाब वक्त के पास है।

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