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Rahul Gandhi Patka Row: राहुल गांधी के 'पटका' पहनने से इनकार पर बवाल, क्यों है असम के लिए अस्मिता का प्रश्न?

Rahul Gandhi Patka Row: असम में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस बीच राहुल गांधी के असम के पारंपरिक पटका पहनने से इनकार कर दिया। इसे लेकर अब राजनीतिक बवाल भी शुरू हो गया है। असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे असमिया संस्कृति का अपमान बताया है। दरअसल गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित 'एट होम' समारोह के दौरान यह प्रकरण हुआ था।

राहुल गांधी को कार्यक्रम के दौरान नॉर्थ ईस्टर्न पटका पहनने के लिए दिया गया था। उन्होंने इसे पहनने के बजाय हाथ में ले लिया। इस पर सियासी बवाल खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं। यह असम और पूरे उत्तर-पूर्व की सांस्कृतिक अस्मिता, सम्मान और स्वाभिमान से जुड़ गया है।

Rahul Gandhi Patka Row

Rahul Gandhi Patka Row: समझें पूरा विवाद

राहुल गांधी के पटका नहीं पहनने पर राजनीतिक संग्राम शुरू हो गया है। यह कथित चूक आने वाले असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है। नॉर्थ ईस्टर्न पटका को असम में आम तौर पर 'गमछा' कहा जाता है। असम के लोगों के लिए यह सिर्फ एक पारंपरिक वस्त्र नहीं है। यह सदियों पुरानी असमिया संस्कृति और पहचान का प्रतीक है।

इसकी जड़ें अहोम साम्राज्य तक जाती हैं, जिसने करीब 600 वर्षों तक असम पर शासन किया। 1228 में स्थापित इस साम्राज्य के दौर में गमछा सम्मान और मर्यादा का प्रतीक बनकर उभरा। इसे सिर्फ पहनने का कपड़ा नहीं, बल्कि आदर-सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

Assam News: असम के लोगों के लिए 'पटका' है अस्मिता का प्रतीक

अहोम काल में गमछा हाथ से करघों पर बुना जाता था। स्थानीय कपास से बने इस वस्त्र पर पारंपरिक लाल किनारी और खास प्रतीक डिजाइन होते थे। समय के साथ इसमें असम की विभिन्न जनजातियों का सांस्कृतिक प्रभाव जुड़ता चला गया। बोडो, मिसिंग, कार्बी और अन्य समुदायों ने अपनी पहचान के अनुसार इसके स्वरूप में बदलाव किए थे। हालांकि, इसका मूल भाव हमेशा आत्मीयता और सम्मान ही बना रहा।

Assam Patka: धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक परंपरा

धार्मिक दृष्टि से भी गमछा असमिया समाज में बेहद महत्वपूर्ण है। वैष्णव परंपरा से जुड़े नामघरों में देवताओं को गमछा अर्पित किया जाता है। बिहू जैसे बड़े त्योहारों में इसे पहनना और भेंट करना परंपरा का हिस्सा है। विवाह, नामकरण और यहां तक कि अंतिम संस्कार जैसे संस्कारों में भी इसका खास स्थान है। जन्म से लेकर मृत्यु तक असमिया जीवन के हर अहम पड़ाव में गमछा मौजूद रहता है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में भी गमछा असमिया समाज की पहचान बना रहा। आजादी के बाद जब असम और उत्तर-पूर्व में पहचान की राजनीति तेज हुई, तब यह सांस्कृतिक के साथ-साथ राजनीतिक प्रतीक भी बन गया। 1960 के दशक के असम भाषा आंदोलन और 1979 से 1985 तक चले असम आंदोलन में गमछा असमिया अस्मिता का प्रतीक बनकर उभरा।

Rahul Gandhi Patka Row: पटका विवाद से कांग्रेस को होगा नुकसान

यही वजह है कि आज नॉर्थ ईस्टर्न पटका को लेकर भावनाएं इतनी गहरी हैं। यह सिर्फ असम तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर-पूर्व में सम्मान का प्रतीक बन चुका है। आधुनिक राजनीति में भी राष्ट्रीय नेताओं और विदेशी मेहमानों को असम यात्रा के दौरान गमछा पहनाया जाना एक स्थापित परंपरा है। 2019 में असमिया गमछा को जीआई टैग मिलना इस बात का सबूत है कि यह वस्त्र सांस्कृतिक के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक पहचान का भी अहम हिस्सा है।

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