राहुल गांधी की नई पर्सनालिटी में जुड़ी पुरानी राजनीतिक सोच

Rahul Gandhi
नई दिल्ली। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी पहुंचे हुए हैं। कांग्रेसियों के साथ चुनावी रणनीति बना रहे राहुल का प्रमुख फोकस यहां के पिछड़े लोग हैं। वो राहुल गांधी जो बात-बात पर यूपी सरकार पर गुस्सा हो जाते थे, अचानक उनकी सोच में बदलाव कैसे आ गया। आख‍िर ऐसा क्या है, जो राहुल की नई सोच में प्रतिबिंबित हो रहा है? उत्तर है जातिवाद की राजनीति।

संसद से सड़क तक हर गलियारे में छिड़ी है बहस कौन होगा प्रधानमंत्री और छिड़ा है युद्ध सभी राजनीतिक दलों के बीच कि कौन होगा कुर्सी का हकदार। इस लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर काम करेगा या आप की खास-ए- आम टोपी या फिर राहुल के पोलिटिकल क्लास का फंडा यह तो वक्त ही बताएगा। पर फिलहाल तो सभी दल पूरी जिददो जहद से जुड़ गए हैं ज़ग-ए-कुर्सी में। ऐसे में अपनी रैलियों से लगातार निराशा मिलने से परेशान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नए-नए हथकण्डों का एक्सपेरीमेंट करने की कोशिश में लग गए हैं और उनका नया पैंतरा है- जातिवाद की राजनीति।

यूं तो धर्मनिरपेक्ष भारत देश में धर्म की आड़ में राजनीति का खेल कोई नया फंडा नहीं है,पर जो लोग देश के युवा सम्राट राहुल गांधी से यह कयास लगाए बैठे थे, कि वो राजनीति की नई रूपरेखा के राहगीर हैं, उनके लिए निश्च‍ित ही यह एक प्रभावशाली खबर है। इन दिनों राहुल गांधी का विषेश रुझान अल्पसंख्यक समुदायों को उनका हक दिलाने की तरफ दिखाई दे रहा है हाल ही में जैन समुदाय को अल्पसंख्यकों का दर्जा दिलाने में जो अहम भूमिका उन्होंने निभाई है, वो उनके नए पोलिटिकल एटीट्यूड को साफ साफ दर्शा रही है।

वैसे तो पहले भी राहुल गांधी ने अपनी राजनीति का मोहरा दलित समुदायों को बनाया पर वो कहां तक सफल हुआ उससे सब परिचित हैं पर देखना यह है, कि क्या इस बार उनका यह जातिवाद फार्मूला काम आता है। हाल ही में उन्होंने अपने एक भाशण के दौरान अपनी पार्टी की उपलबिधयाँ गिनाते हुए और विपक्ष को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस एक सोच का नाम है, जिसका मतलब भाईचारा, प्रेम और ईज़्ज़त है, जो भारत की 3000 साल पुरानी सोच है। पिछले 3000 साल में तो यह सोच मिटी नहीं और किसी ने इस सोच को मिटाने का प्रयास किया तो वह खुद ही मिट गया।

राहुल गांधी को अचानक याद आ रहे हैं अलग-अलग जातियों के लोग!

इतना ही नहीं इससे पहले सम्राट-ए-कांग्रेस अचानक से मुज़्फ्फरनगर दंगा पीडि़तों के कैम्प का मुआइना करने भी पहुंचे, वही दंगा जिसके लिए कुछ मुसलमानों को राहुल जी ने आईएसआई का ऐजेंट तक घोशित करते हुए दंगों का दोषी बताया और आज वही राहुल मुसलमानों को जता रहे हैं कि पाकिस्तान का बंटवारा उनके परिवार द्वारा किया गया उपकार है।

और तो और राहुल गांधी ने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय के लोगों को अपने घर बुलाया और उनकी समस्याएं सुनीं। सवाल तो यह उठता है कि हरियाणा और केंद्र में कांग्रेस की सरकार है, इसके बावजूद अब तक वहां के जाट समुदाय के लोग तमाम समस्याओं से ग्रसित हैं।

अब बात अगर पिछड़ा वर्ग के लोगों की करें तो उन्हें भी रिझाने के लिये राहुल गांधी ने करीब दो महीने पहले कहा था कि पिछड़ा वर्ग के लोगों के पिछड़ेपन की जिम्मेदार मायावती हैं। यही नहीं 12 दिसंबर 2013 को दिल्ली में एससी, एसटी के एक सम्मेलन में हिस्सा लिया और कहा कि हम जो भी हम लिखकर देंगे, वो हम करेंगे। अब इसे क्या समझा जाए अचानक से दलितों अल्पसंख्यकों के ‍लिए राहुल जी का यह अपनापन है या उनका नया राजनीतिक पैंतरा। खैर जो भी हो देखना यह है कि क्या राहुल का यह नया फंडा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का पंचम लहरा पाएगा?

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