पारिवारिक कलह ने डुबो दी अखिलेश यादव की नैया
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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए साल 2017 अच्छा नहीं रहा। 2017 में जहां एक ओर अखिलेश यादव सत्ता से बाहर हो गए तो वहीं परिवार में पार्टी की बागडोर को लेकर हुए कलह के चलते पार्टी दो धड़ों में बंट गई। अखिलेश के खिलाफ उनके पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवापाल सिंह यादव मैदान में आ गए। महीनों पार्टी की बागडोर को लेकर मची खींचतान के बाद अखिरकार पार्टी की कमान अखिलेश यादव को मिल गई।

फरवरी-मार्च 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। 2012 में 224 सीट के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई समाजवादी पार्टी 2017 के चुनावों में केवल 47 सीटों पर ही सिमट गई। इस हार के बाद अखिलेश को न सिर्फ अपने पिता और चाचा की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा बल्कि मीडिया ने भी जमकर अखिलेश यादव की आलोचना की।
वहीं पार्टी की कमान को लेकर मचा घमासान चुनाव आयोग तक पहुंच गया। चुनाव आयोग ने पार्टी का चुनाव निशान जब्त कर लिया। लेकिन अखिलेय़ यादव पार्टी के प्रमुख नेताओं और विधायकों को अपने पाले में लाने में सफल हुए। 25 साल पहले मुलायम सिंह द्वारा बनाई गई समाजवादी पार्टी पर अब अखिलेश यादव का कब्जे थी। अखिलेश ने इस जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाया। लेकिन अखिलेश यादव की मुश्किलें यहीं कम नहीं हुई। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आई भाजपा सरकार ने अखिलेश यादव द्वारा चलाई जा रही कई परियोजनाओं पर जांच बैठा दी। अखिलेश के ड्रीम प्रोजेक्ट गोमती रिवर फ्रंट में हुए घोटाला पर सीबीआई ने दिंसबर में एफआईआर दर्ज कर दी।
2017 में हुई उथल-पुथल के बावजूद साल के आखिरी महीने अखिलेश य़ादव के लिए थोड़ा राहत वाले रहे। जहां मुलायम सिंह यादव के साथ उनके बिगड़े रिश्तों में मधुरता देखने को मिली तो वहीं हाल ही में हुए निकाय चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में सुधार हुआ।












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