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जानिए कौन हैं रेमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता सोनम वांगचुक और भारत वटवानी

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    नई दिल्ली। भारत के सोनम वांगचुक और भारत वटवानी को इस बार रेमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। संस्था ने 2018 के पुरस्कारों के लिए छह लोगों के नामों की घोषणा की है। वांगचुक को प्रकृति, संस्कृति और शिक्षा के जरिए सामुदायिक प्रगति के लिए काम करने को लेकर सम्मानित किया गया है। वहीं वटवानी को सड़क पर भीख मांगने वाले हजारों मानसिक तौर पर बीमार लोगों को रेस्क्यू कर उनके परिवार वालों से मिलाने के लिए यह पुरस्कार दिया गया है।

    Magsaysay award

    सोनम वांगचुक बर्फीले रेगिस्तान में बच्चों के लिए शिक्षा में सुधार का बीड़ा उठाए हुए हैं। इस दुर्गम इलाके में सोनम और उनके साथियों ने 1988 में एक अभियान खड़ा कर दिया था, जिसे स्टूडेंट एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख यानी सेकमॉल कहा जाता है। सर्वशिक्षा अभियान से दस साल पहले उनका अभियान शुरू हो चुका था। इसमें वे छात्र आते हैं, जिन्हें सरकार फेल कर देती है। ये आगे जाकर वैज्ञानिक, कारोबारी बने हैं। सैकड़ों विद्यार्थी बड़े ओहदों पर पहुंचे हैं।

    1 सितंबर 1966 को जन्मे सोनम वांगचुक ने एनआईटी श्रीनगर से इंजीनियरिंग की है। बचपन में वांगचुक सात साल तक अपनी मां के साथ एक रिमोट लद्दाखी गांव मेें रहे। यहां उन्होंने कई स्थानीय भाषाएं भी सींखीं। बाद में जब उन्होंने लद्दाख में शिक्षा के लिए काम करना शुरू किया तो उन्हें अहसास हुआ कि बच्चों को सवालों के जवाब पता होते हैं लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी भाषा की वजह से होती है। इसके बाद उन्होंने स्थानीय भाषा में ही बच्चों की शिक्षा के लिए कवायद करनी शुरू की

    लद्दाख गर्मी के सीजन में पानी की कमी से अक्सर जूझता था। इससे निपटने के लिए सोनम ने अपने छात्रों के साथ मिलकर एक अभियान चलाया। उन्होंने स्थानीय लोगों से कहा कि वे बर्फ के स्तूप बनाएं, जो 40 मीटर ऊंचे हों। ऐसे एक स्तूप से क़रीब एक करोड़ 60 लाख लीटर पानी की व्यवस्था हो जाती है, जिससे 10 हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई की जा सकती है। इसकी प्रेरणा उन्हें चेवांग नॉर्फेल द्वारा बनाए गए कृत्रिम ग्लेशियर्स से मिली। उनके फाउंडेशन ने अब तक हजारों पेड़ और बगीचे लद्दाख के रेगिस्तान में लगा चुके हैं।

    सोनम वांगचुक ने 1988 में इंजिनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद स्टूडेंट्स एजुकेशन ऐंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना की। सोनम को एसईसीएमओएल परिसर को डिजाइन करने के लिए भी जाना जाता है जो पूरी तरह से सौर-ऊर्जा पर चलता है, और खाना पकाने, प्रकाश या तापन (हीटिंग) के लिए जीवाश्म ईंधन का उपयोग नहीं करता है।

    bharat

    भारत वटवानी

    डॉ. भारत वटवानी और उनकी पत्नी स्मिता वटवानी दोनों ही मनोचिकित्सक हैं। वटवानी दंपति ने 80 के दशक में मानसिक रुप से बीमार लोगों की मदद के लिए एक प्राइवेट अस्पताल खोला था। जहां पर सड़कों पर पड़े मानसिक तौर पर बीमार लोगों को नई जिंदगी दे सकें। इसके लिए भारत वटवानी ने एक अनौपचारिक अभियान की शुरुआत की। वटवानी ने मानसिक रूप से बीमार सड़क के लोगों को इलाज के लिए अपने निजी क्लीनिक में लाने का एक अनौपचारिक अभियान शुरू किया था।

    इसके बाद उन्होंने सड़कों पर रह रहे मानसिक रोगियों को आश्रय देने, खाना मुहैया कराने, दिमागी इलाज कराने और परिवार से मिलवाने के मकसद से सन 1988 में श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन की स्थापना की। जो ना सिर्फ ऐसे लोगों की इलाज करता है बल्कि मानसिक तौर पर घर से बिछड़े लोगों को परिवार वालों से मिलाया। उनके बचाव कार्य को पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ताओं का भरपूर साथ मिला है। अब तक इस दंपति ने हजारों लोगों की।

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    English summary
    profile of Magsaysay award winners Bharat Vatwani and Sonam Wangchuk

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