कमांडेंट प्रमोद कुमार जिनकी शहादत हमेशा रहेगी याद
श्रीनगर। सोमवार को जहां पूरा देश आजादी की 70वीं सालगिरह मना रहा था, कश्मीर में सुरक्षाबल और जवान आतंकियों से मोर्चा ले रहे थे। श्रीनगर के नौहट्टा में हुए आतंकी हमले में सीआरपीएफ के जवान आतंकियों को जब खदेड़ने में लगे थे तो कमांडेंट प्रमोद कुमार जवानों की अगुवाई कर रहे थे।

वह बहादुरी से आतंकियों के सामने डटे हुए थे लेकिन आजादी का मौका उनकी शहादत के लिए मुकर्रर हो चुका था। जिस जगह पर कमांडेंट प्रमोद कुमार शहीद हुए वह जगह एतिहासिक जामा मस्जिद के पास ही है। एक नजर डालिए कौन थे कमांडेंट प्रमोद कुमार और क्यों उनकी शहादत को देश कभी भुला नहीं पाएगा।
दो वर्षों से कश्मीर में तैनात
- 12 जुलाई को बेटी के बर्थडे के मौके पर उन्हें बटालियन के सीओ के तौर पर प्रमोशन मिला था।
- प्रमोद कुमार पिछले दो वर्षों से कश्मीर में तैनात थे और इस वर्ष अमरनाथ यात्रा के सुरक्षा इंतजामों को देख रहे थे।
- उनके पास नौहट्टा जैसे कई और एनकाउंटर्स को बखूबी अंजाम देने का अनुभव था।
- वर्ष 2014 में उन्हें 'हाइएस्ट ऑपरेशनल अक्यूमन' के लिए कमांडेंशन सर्टिफिकेट दिया गया।
- सीआरपीएफ चीफ के दुर्गा के मुताबिक वर्ष 2015 में उन्हें डीजी की ओर से कमांडेशन के लिए पुरस्कार भी मिला।
- प्रमोद कुमार सीआरपीएफ की 49वीं बटालियन के इनचार्ज भी थे।
- यहां पर उन्होंने कई अलग-अलग तरह के ऑपरेशंस को अंजाम दिया और अपनी क्षमताओं को साबित किया।
- वर्ष 2012 से 2014 तक वह स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी के साथ डेप्यूटेशन पर जम्मू कश्मीर में तैनात थे
- पश्चिम बंगाल स्थित उनके घर में पत्नी नेहा, सात वर्ष की बेटी अर्न और 63 वर्ष के पिता रहते हैं।
- प्रमोद अपने माता-पिता की पांच संतानों में इकलौते बेटे थे।
- उनकी पत्नी नेहा के मुताबिक वह सबका काफी ध्यान रखते थे और बिल्कुल भी सख्त नहीं थे।
- शहीद प्रमोद कुमार झारखंड के जामताड़ा के रहने वाले थे।












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