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राइट टू प्राइवेसी पर आज 9 जजों की बेंच करेगी सुनवाई, तय हो सकता है आधार का भविष्य

आज ,

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट जल्द ही तय करेगा कि प्राइवेसी का अधिकार किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है या नहीं। इस फैसले से आधार कार्ड का भविष्य भी तय हो सकता है। इसमें ऐतिहासिक फैसले की संभावना है जो नागरिकों की प्राइवेसी की सीमा को परिभाषित करेगा और साथ ही राज्य के अधिकार को प्रतिबंधित कर सकेगा । वर्तमान में, ना तो संविधान और ना ही कोई कानून प्राइवेसी को मौलिक अधिकार मानता है। आज बुधवार को जो सुनवाई होगी वो आधार योजना के लिए भी काफी महत्वपूर्ण होगी।

निजता का अधिकार पर आज 9 जजों की बेंच करेगी सुनवाई, आधार का भविष्य भी होगा तय

पांच जजों की पीठ की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जगदीश सिंह खेहर ने मंगलवार (18 जुलाई ) को कहा कि- 'यह निर्धारित करना हमारे लिए जरूरी हो गया है कि क्या भारतीय संविधान के तहत प्राइवेसी कोई मूलभूत अधिकार है या नहीं।' बता दें कि 5 सदस्यीय जजों की पीठ में खेहर के अलावा जे चेलामेश्वर,डी वाई चंद्रचूड़, एस.एस. बोडबे और एस अब्दुल नजीर शामिल है।

4 जज और शामिल

हालांकि अब इस मामले की सुनवाई 9 सदस्यीय जजों की पीठ करेगी जिनमें उपरोक्त पांच जजों के अलावा, जस्टिस आर के अग्रवाल, आर एफ नरीमन, ए.एम. सपरे और संजय किशन कौल शामिल हैं। इस मामले की सुनवाई आज बुधवार को भी होगी।

बता दें कि 9 जजों की नई बेंच सुप्रीम कोर्ट की ओर से ही साल 1954 और साल 1962 में दिए फैसलों पर भी विचार करेगी। दोनों ही मामलों में संवैधानिक पीठ ने राइट टू प्राइवेसी को अधिकार नहीं माना था। हालांकि साल 1975 के बाद दो और तीन जजों की संवैधानिक पीठ ने राइट टू प्राइवेसी को अपने फैसलों में मौलिक अधिकार माना है।

आधार के लिए भी अहम है फैसला

बता दें कि आज बुधवार को होने वाली सुनवाई आधार के लिए भी अहम है। दरअसल, इसके अंतर्गत आंखें स्कैन की जाती हैं और ही फिंगर प्रिंट लिए जाते है। इस योजना में 'राइट टू प्राइवेसी' के हनन के खिलाफ याचिका दायर की गई है। अगर 9 सदस्यीय बेंच राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकार मान लेती है तो आधार की योजना को करारा झटका लगेगा।

गौरतलब है कि संविधान में स्वतंत्रता के अधिकार में आर्टिकल 21 में 'प्राण और देह की स्वतंत्रता का अधिकार' दिया गया है। इसके अंतर्गत कुछ खास अधिकार हैं, जैसे गरिमा का अधिकार, आजीविका के अधिकार, दासता के खिलाफ और , निजता का अधिकार इत्यादि शामिल है। कोई कानून अगर इन अधिकारों का हनन करता है तो कोर्ट उसे गैरकानूनी करार दे सकता है।

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