इंटरनेट के दौर में भी जमानत के आदेश के लिए कबूतरों के भरोसे बैठे हैं जेल अधिकारी- सुप्रीम कोर्ट

कैदियों को जमानत देने में देरी पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य सरकारों से कहा कि उनके क्षेत्र की कितनी जेलों में इंटरनेट कनेक्शन हैं।

नई दिल्ली, 17 जुलाई। कैदियों को जमानत देने में देरी पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य सरकारों से यह बताने को कहा कि उनके क्षेत्र की कितनी जेलों में इंटरनेट कनेक्शन हैं और बंदियों की शीघ्र रिहाई सुनिश्चित करने के लिए कब तक जेलों को इंटरनेट सुविधाओं से लैस कर दिया जाएगा।

Supreme Court

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) नुथलापति वेंकट रमना की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत के तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वह जल्द ही एक ऐसा सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन तंत्र तैयार करेगी जिससे कैदियों की जमानत को लेकर दिया गया आदेश जेल अधिकारियों तक कम समय में पहुंच सके, ताकि जल्द से जल्द कैदियों को जमानत मिल सके।

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अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि इंटरनेट के युग में जेल अधिकारी कबूतरों के माध्यम से संचार के पुराने तरीकों पर भरोसा कर रहे हैं। पीठ ने अपने महासचिव से एमिकस क्यूरी (अदालत के मित्र) वरिष्ठ वकील, दुष्यंत दवे और सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता से इस मामले में परामर्श करने के लिए भी कहा ताकि सुप्रीम कोर्ट से जेलों तक संचार के सुरक्षित प्रत्यक्ष इलेक्ट्रॉनिक मोड की तत्काल व्यवस्था करने की कोशिश की जा सके।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि उसके निर्देश में गठित उच्चाधिकार समितियों (एचपीसी) ने कैदियों के बीच कोविड के प्रसार को रोकने के लिए महामारी के दौरान उनकी रिहाई का फैसला करने में कैदियों की उम्र, उनके रोग और अन्य शर्तों पर विचार किया है या नहीं।

गौरतलब है कि कोर्ट ने जमानत का आदेश दिए जाने के बाद भी कैदियों की रिहाई में हो रही देरी का स्वत: संज्ञान लिया था। बता दें कि 8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने यह ध्यान में रखते हुए 13 कैदियों को अंतरिम जमानत दी थी, कि उन्हें अपराध के समय किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) द्वारा किशोर घोषित किया गया था और वे पहले से ही 14 साल की जेल की सजा काट चुके थे और वर्तमान में निजी मुचलके पर उत्तर प्रदेश की आगरा जेल में बंद हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने इनकी रिहाई में देरी की और उन्हें चार दिनों बाद रिहा किया गया। इसका कारण बताते हुए जेल अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें आदेश की प्रमाणित कॉरी डाक से नहीं मिली।

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