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Presidential election: कब BJP पर भारी पड़ सकता है विपक्ष ? जानिए

नई दिल्ली, 15 जून: 18 जुलाई को होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव में वोटों के अंक गणित में विपक्ष का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। सत्ताधारी एनडीए की स्थिति मजबूत जरूर है, लेकिन बिना विपक्ष के सहयोग से वह अपना राष्ट्रपति बनाने की स्थिति में नजर नहीं आ रहा है। यही वजह है कि टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एकजुट करने के मिशन पर निकली हुई हैं। इसके जवाब में सत्ताधारी बीजेपी भी अपनी तैयारी कर रही है और वह किसी भी सूरत में विपक्ष की दाल गलने नहीं देना चाहेगी। आइए समझते हैं, राष्ट्रपति चुनाव का पूरा राजनीतिक समीकरण क्या है?

राष्ट्रपति चुनाव कब है ?

राष्ट्रपति चुनाव कब है ?

देश के नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया बुधवार से शुरू हुई है। 18 जुलाई को वोटिंग होगी और 21 जुलाई, 2022 को चुनाव परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को खत्म हो रहा है। देश के नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए सत्ताधारी बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए और विपक्षी दलों के बीच जबर्दस्त गोलबंदी शुरू हो चुकी है। मोटे तौर पर देखें तो राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटों के समीकरण में केंद्र में सत्ताधारी एनडीए का पलड़ा भारी है, लेकिन अगर सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए तो भाजपा को अपनी पसंद का राष्ट्रपति बना पाना मुश्किल हो सकता है।

राष्ट्रपति चुनाव का अंक गणित

राष्ट्रपति चुनाव का अंक गणित

संसद के दोनों सदनों के सांसद और सभी राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक भारत के राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदान करते हैं। इस तरह से लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 233 सांसद नए राष्ट्रपति को चुनने के लिए 18 जुलाई को मतदान करेंगे। इनके अलावा देशभर की विधानसभाओं के कुल 4,809 एमएलए भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि विभिन्न राज्यों की जनसंख्या और वहां के विधायकों की संख्या के आधार पर सदस्यों (विधायकों) के मतों का मूल्य अलग-अलग होता है। मसलन, देश में यूपी के विधायकों के मतों का मूल्य सबसे ज्यादा है। इस तरह से राष्ट्रपति के चुनाव में मतदाताओं के वोटों का कुल मूल्य 10,86,431 है। यानी विपक्ष या सत्तापक्ष के उम्मीदवार को यह चुनाव जीतने के लिए कम से कम 5,43,216 वैल्यू के वोट की जरूरत पड़ेगी।

कब बीजेपी पर भारी पड़ सकता है विपक्ष ?

कब बीजेपी पर भारी पड़ सकता है विपक्ष ?

सीधे और सपाट रूप से आकलन करें तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए के पास 48% वोट हैं। यानी तय है कि वह अकेले अपने दम पर राष्ट्रपति भवन में अपना उम्मीदवार पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। विपक्ष में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए के पास 23% वोट हैं। यूपीए के अलावा टीएमसी, एएपी,सपा, बसपा, टीआरएस,बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, एआईएमआईएम, वामपंथी गठबंधन जैसी अनेकों पार्टियां हैं, जो विपक्ष में हैं। अगर वोट वैल्यू की बात करें तो यूपीए के पास 2,59,892 वोट हैं, तो बाकी विपक्षी दलों के पास 2,92,894 वोट हैं। अगर यह सारे वोट एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ एकजुट हो गए तो भारतीय जनता पार्टी का खेल खराब हो सकता है। क्योंकि, विपक्ष के पास 51% वोट है, जो कि अगला राष्ट्रपति चुनने के लिए पर्याप्त है।

राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष की गोलबंदी

राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष की गोलबंदी

भाजपा के उम्मीदवार के खिलाफ विपक्ष का साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिशों की अगुवाई टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं। मंगलवार को इस सिलसिले में वह एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के साथ भी चर्चा कर चुकी हैं। ममता ने बुधवार को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों की एक बैठक भी बुलाई है। लेकिन, टीएमसी नेता की इन कोशिशों के बावजूद विपक्षी एकता को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं।

विपक्ष का पलड़ा पड़ सकता है हल्का

विपक्ष का पलड़ा पड़ सकता है हल्का

एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी को विपक्ष की बैठक से दूर कर दिया गया है तो टीआरएस, बीजेडी, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के भी विपक्ष की इस बैठक से दूर रहने की संभावना है। पिछले हफ्ते बनर्जी ने 19 दलों के नेताओं को इस बैठक के लिए बुलावा भेजा था। बीएसपी को भी इस बैठक से दूर रखा गया है। जानकारी के मुताबिक टीआरएस इस बात से नाराज है कि विपक्ष की बैठक में कांग्रेस को क्यों बुलाया गया।

एनडीए का पलड़ा क्यों पड़ रहा है भारी ?

एनडीए का पलड़ा क्यों पड़ रहा है भारी ?

विपक्षी दलों में राष्ट्रपति पद के साझा उम्मीदवार देने के पक्ष में एकजुटता की फिलहाल स्पष्ट कमी नजर आने से सत्ता पक्ष का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। क्योंकि, एनडीए के पास जितने भी वोट हैं, वह पूरी तरह से एकजुट हैं। उसे विपक्षी दलों से मामूली समर्थन की दरकार है और पिछले कई अहम मुद्दों पर कुछ विपक्षी दलों ने सदन में जिस तरह से उसका समर्थन दिया है तो इसमें कोई बड़ी दिक्कत भी नजर नहीं आती। मसलन, ओडिशा में सत्ताधारी बीजेडी के पास 31,000 मूल्य के वोट हैं, वहीं आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी वाईएसआर कांग्रेस के पास कुल 43,000 मूल्य के वोट हैं। ये दोनों दल अनेक मौके पर बीजेपी के साथ गए हैं और एनडीए को अपना राष्ट्रपति बनाने के लिए इनमें से किसी एक का भी समर्थन काफी है।

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