चीन मुद्दे के सहारे राहुल गांधी की दोबारा लॉन्चिंग की है तैयारी ? संकेत समझिए

नई दिल्ली- 'चौकीदार चोर है' वाला राहुल गांधी का नारा 2019 के आम चुनाव में बुरी तरह फेल हो गया था। 'मैं भी चौकीदार' के पलटवार से भाजपा ने लोकसभा चुनावों में राहुल की अगुवाई वाली कांग्रेस को ऐसा धोया कि राहुल ने उस समय सारी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ा लिया। लेकिन, कांग्रेसी कल्चर के तहत पार्टी की व्यवस्था उनकी मां के पास ही बनी रही। लेकिन, कोरोना वायरस और उससे भी ज्यादा पूर्वी लद्दाख और गलवान घाटी के मुद्दे पर राहुल फिर से जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं और निजी हमले पर उतरे हुए हैं, उससे लगता है कि वो एकबार फिर से पार्टी की जिम्मेदारी संभालने का मन बना रहे हैं। वो दोनों मुद्दों पर पार्टी को फ्रंट से लीड करना चाह रहे हैं। चीन जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर भी कांग्रेस बाकी विपक्षी दलों से भी मुंह मोड़कर राहुल के अंदाज में सरकार और खासकर पीएम मोदी के खिलाफ जिस तरह से हमले कर रही है, उससे लगता है कि एक तरह से राहुल को दोबारा कमान सौंपने की तैयारी हो चुकी है। कांग्रेस के तमाम बड़े नेता वही बातें दोहरा रहे हैं, जो राहुल गांधी बोल रहे हैं। उनमें सबसे ताजा नाम है पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का।

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    राहुल के बयानों को मिला मनमोहन का साथ

    राहुल के बयानों को मिला मनमोहन का साथ

    राहुल गांधी के 'सरेंडर मोदी' वाले ट्वीट के एक दिन बाद ही जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीन के मसले पर प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की कूटनीति और रक्षानीति पर सीधा हमला किया है, उसमें पूरे करियर में बेहद शांत स्वाभाव के रहे मनमोहन की कम और राहुल की स्टाइल ज्यादा नजर आत है। उन्होंने अपने बयान में एक तरह से गलवान घाटी को लेकर दिए गए पीएम मोदी के बयान के शब्दों पर ही आपत्ति जताई है। मनमोहन के मुताबिक प्रधानमंत्री को अपने शब्दों और घोषणाओं द्वारा देश की सुरक्षा और सामरिक एवं भू-भागीय हितों पर पड़ने वाले प्रभाव के प्रति सदैव बेहद सावधान होना चाहिए। मनमोहन ने कहा, 'चीन ने अप्रैल, 2020 से लेकर आज तक भारतीय सीमा में गलवान घाटी एवं पैंगोंग त्सो झील इलाके में अनेकों बार घुसपैठ की है।' उन्होंने कहा कि 'आज हम इतिहास के एक नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। हमारी सरकार के निर्णय एवं सरकार द्वारा उठाए गए कदम तय करेंगे कि भविष्य की पीढ़ियां हमारा आकलन कैसे करेंगी। जो देश का नेतृत्व कर रहे हैं, उनके कंधों पर कर्तव्य का गहन दायित्व है...' उनके मुताबिक हमारे प्रजातंत्र में यह दायित्व देश के प्रधानमंत्री का है। पूर्व पीएम के अनुसार, 'हम सरकार को आगाह करेंगे कि भ्रामक प्रचार कभी भी कूटनीति और मजबूत नेतृत्व का विकल्प नहीं हो सकता। पिछलग्गू सहयोगियों द्वारा प्रचारित झूठ के आडंबर से सच्चाई को नहीं दबाया जा सकता...' यानि मनमोहन सिंह ने जिस लाइन पर प्रधानमंत्री मोदी को घेरने की कोशिश की है, उसमें राहुल वाली लाइन की ही ज्यादा सभ्य शब्दों में विस्तार की झलक नजर आ रही है।

    चीन के मुद्दे पर विपक्षी दलों से भी अलग रुख

    चीन के मुद्दे पर विपक्षी दलों से भी अलग रुख

    अब जरा गलवान घाटी की घटना के मसले पर प्रधानमंत्री मोदी की ओर से बुलाई गई बैठक पर गौर करते हैं। उस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष और राहुल की मां सोनिया गांधी मुख्यतौर पर एकमात्र विपक्ष की नेता थीं, जो इस मसले पर भी सरकार पर सवाल पर सवाल दाग आई थीं। उन्होंने बार-बार पूछा 'क्या चीनी ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की?' यानि सोनिया से लेकर मनमोहन तक के बयानों में राहुल के शब्दों से पूरी तरह तालमेल नजर आ रही है। जबकि, उस बैठक में कई विपक्षी पार्टियां देश की सुरक्षा के मुद्दे पर सोनिया के सवालों से बिल्कुल ही सहमत नहीं थीं। कांग्रेस की सहयोगी और एनसीपी शरद पवार ने तो सीधा कह दिया कि ये सरकार के साथ एकजुटता दिखाने का वक्त है। उन्होंने 'जवानों को निहत्थे क्यों भेजा' वाले राहुल के बयान पर भी असहमति जताई, लेकिन कांग्रेस चीन के मुद्दे पर सरकार को अकेले टक्कर देना चाहती है और इसके लिए पूरी पार्टी राहुल के पीछे लामबंद हो रही है। लोकसभा चुनावों में राहुल को शायद यही कमी खली थी।

    अबकी बार राहुल के साथ कांग्रेस की लाबंदी

    अबकी बार राहुल के साथ कांग्रेस की लाबंदी

    मतलब, साफ है कि इसबार पार्टी राहुल की सोच के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है। मनमोहन और सोनिया ही नहीं, कैप्टन अमरिंदर सिंह और अशोक गहलोत जैसे नेता भी सार्वजनिक तौर पर राहुल की भावना को ही पेश करते नजर आए हैं। यूं कह लीजिए कि इस वक्त मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस की रणनीति में पहले से कहीं ज्यादा एकरूपता नजर आ रही है। पार्टी के सारे नेता राहुल वाले आक्रामक बयानों के साथ ही खड़े नजर आ रहे हैं। वह बाकी विपक्षी दलों से भी मुख्तलिफ होकर राहुल की रणनीति को सही मान रहे हैं और उसी धारा के प्रवाह के साथ बह चलना चाहते हैं।

    चीन मुद्दे के सहारे राहुल की दोबारा लॉन्चिंग की तैयारी ?

    चीन मुद्दे के सहारे राहुल की दोबारा लॉन्चिंग की तैयारी ?

    कांग्रेस का मौजूदा तेवर तब है, जब भाजपा ने चीन के साथ समझौते वाली गांधी परिवार के फुटेज जारी किए हैं। लेकिन, कांग्रेस फिलहाल उसपर चुप्पी साधे रखने में ही भलाई समझ रही है। वह इस मामले पर सरकार के खिलाफ खड़ी अकेली पार्टी नजर आना चाहती है। जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी की रणनीति के मुताबिक पूरी पार्टी की लामबंदी असल में उनकी वापसी की ही रणनीति लगती है। मतलब, साफ है कि राहुल भले ही बार-बार कह चुके हों कि उन्होंने तो इस्तीफा दे दिया है, लेकिन सोनिया को उन्हें फिर से राज्याभिषेक कराने के लिए एक सही मुद्दे का इंतजार है; और हो सकता है कि पार्टी को चीन के साथ तनाव वाला मुद्दा उसके लिए सबसे मुफीद लग रहा हो। हालांकि, इस रणनीति का परिणाम क्या राफेल-2 साबित होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

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