'जनसंख्या नहीं मिटा सकते'....सुप्रीम कोर्ट का जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार
Population Control law: सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी के अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा है कि यह मामला सरकार के क्षेत्राधिकार वाला है। अदालत ने यहां तक कहा कि जनसंख्या में तो गिरावट दर्ज की जा रही है....। अदालत ने इस संबंध में विधि आयोग को भी किसी तरह का निर्देश देने से साफ मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जनसंख्या को मिटाया नहीं जा सकता। दरअसल, सरकार भी पहले आबादी दर में गिरावट की बात कह चुकी है। आखिरकार अश्विनी उपाध्याय ने अदालत से अपनी याचिका वापस ले ली है।

जनसंख्या नियंत्रण कानून वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जनसंख्या विस्फोट पर भारतीय विधि आयोग को रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश देने और जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय किशन कॉल और जस्टिस एएस ओक की बेंच ने कहा कि यह विषय पूरी तरह से सरकार के क्षेत्राधिकार वाला है और यह भी कहा कि 'जनसंख्या घट रही है।' अदालत ने कहा है कि कई मुद्दे हैं, जिसमें सामाजिक भी है, इसलिए अदालत इसमें नहीं पड़ सकता है। जस्टिस कौल ने मौखिक टिप्पणी की कि 'जनसंख्या में गिरावट आ रही है और हो सकता है कि 10 या 20 वर्षों में यह स्थिरीकरण के बिंदु तक पहुंच जाए।.....हम जनसंख्या नहीं मिटा सकते। यहां तक कि विधि आयोग को कैसे निर्देश दिया सकता है... '

जनसंख्या नियंत्रण कानून पर सरकार ने क्या कहा था?
याचिका के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण के लिए वह दंपति के साथ जबर्दस्ती नहीं कर सकती कि 'इतने ही बच्चे रखना है'। सरकार ने कहा था कि 2001-2011 के बीच भारतीयों में 100 वर्षों में जन्म दर में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई थी। सरकार ने कहा था कि 'परिवार का आकार दंपतियों को तय करना है।' अपने हलफनामे में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा था, 'भारत में परिवार कल्याण कार्यक्रम स्वभाव में स्वैच्छिक है, जिसके तहत दंपति बिना किसी बाध्यता के परिवार का आकार तय करने और परिवार नियोजन के उन तरीकों को अपनाने में सक्षम हैं, जो उनके लिए सबसे उपयुक्त हों, उनकी पसंद के अनुसार हैं। '

भारत ने कर रखे हैं प्रोग्राम ऑफ ऐक्शन पर हस्ताक्षर
सरकार की ओर से यह भी कहा गया था कि भारत ने 1994 में इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट के प्रोग्राम ऑफ ऐक्शन (POA)पर हस्ताक्षर कर रखे हैं, जो परिवार नियोजन में जबर्दस्ती के सख्त खिलाफ था। सरकार ने बताया था, 'वास्तव में, अंतरराष्ट्रीय अनुभव से पता चलता है कि एक निश्चित संख्या में बच्चे पैदा करने के लिए की गई जबरदस्ती का विपरीत असर पड़ता है, जो कि जनसांख्यिकीय विकृतियों की ओर ले जाती है।'

जनसंख्या नियंत्रण पर अश्विनी उपाध्याय की दलील
वकील अश्विनी उपाध्याय ने दलील दी थी कि 'जनसंख्या विस्फोट बम विस्फोट से ज्यादा खतरनाक है और बिना प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण कानून को लागू किए बिना स्वस्थ भारत, शिक्षित भारत, समृद्ध भारत, साधन-संपन्न भारत, सशक्त भारत, सुरक्षित भारत, संवेदनशील भारत, स्वच्छ भारत और भ्रष्टाचार एवं अपराध-मुक्त भारत का अभियान सफल नहीं होगा। ' उन्होंने यह भी दलील दी थी कि भारत के पास दुनिया की सिर्फ 2 फीसदी जमी है, जबकि आबादी 20 फीसदी है। लेकिन, सरकार ने प्रतिवाद करते हुए कहा था कि भारत टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) में 'लगातार गिरावट' देखी जा रही है।

टोटल फर्टिलिटी रेट में लगातार गिरावट
सरकार ने कहा कि जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, '2001 से 2011 पिछले 100 वर्षों में पहला दशक है, जिसमें पिछले के मुकाबले ना केवल कम आबादी जुड़ी है, बल्कि 1991-2001 के 21.54% के मुकाबले 2001-2011 में 17.64% वृद्धि ही दर दर्ज हुई है, जो कि सबसे ज्यादा गिरावट है।' सरकार के मुताबिक जब राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 अपनाई गई थी, तब टोटल फर्टिलिटी रेट 3.2 थी, जो कि 2018 में सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के मुताबिक काफी घटकर 2.2 रह गई है।












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