कर्नाटक में चावल आपूर्ति पर सियासी घमासान, क्या हार के कारण BJP बदले की राजनीति कर रही है?
कर्नाटक में चावल आपूर्ति को लेकर सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। राज्य सरकार केंद्र पर बदले की राजनीति का आरोप लगा रही है। इस मुद्दे पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन भी किया है वहीं भाजपा इस आरोप को गलत बता रही है।
कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि कर्नाटक हारने के बाद, मोदी सरकार कर्नाटक और अन्य जगहों पर योजनाओं को सफल नहीं होने देना चाहती है और इसके लिए सारी शक्ति का दुरुपयोग करती दिख रही है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा कर्नाटक सरकार की अन्न भाग्य योजना के लिए चावल उपलब्ध कराने से इनकार करना एक अच्छी तरह से डिजाइन की गई राजनीतिक रणनीति प्रतीत होती है।

कर्नाटक में हारना भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति को बड़ा झटका माना जा रहा है। कर्नाटक में भाजपा की हार ने यह साबित कर दिया है कि अगर आपकी सरकार पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबी है तो आपको हारने से कोई नहीं बचा सकता है। भ्रष्टाटार के आगे आपकी हिंदुत्व की राजनीति भी फेल हो जाएगी। अब कर्नाटक की हार ने आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में अमित शाह और पीएम मोदी को गहरे आत्ममंथन के लिए धकेल दिया है। इस हार ने भाजपा की दक्षिण की राजनीति को गहरा झटका दिया है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक सरकार ने अपनी ओपन मार्केट सेल्स स्कीम (घरेलू) के माध्यम से अपनी अन्न भाग्य योजना के लिए एफसीआई क्षेत्रीय कार्यालय के समक्ष 34 रुपये की दर से 2.08 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) चावल की मांग रखी। कर्नाटक एफसीआई के क्षेत्रीय प्रबंधक शनमुगा प्रिया ने 12 जून को एक उत्तर पत्र के माध्यम से क्षेत्रीय भंडारण से चावल जारी करने के लिए अनुमोदन प्रदान किया। इसके अगले ही दिन खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने यह मंजूरी वापस ले ली. एफसीआई के सीएमडी को संबोधित एक पत्र में, मंत्रालय ने बताया कि "ओएमएसएस (डी) के तहत राज्य सरकारों को गेहूं और चावल की बिक्री बंद कर दी गई है।
बता दें कि ओएमएसएस (डी) के तहत आवश्यक स्टॉक को बफर के रूप में रखते हुए निजी व्यापारियों और राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं को चावल जारी करना एफसीआई की जिम्मेदारी रही है। अब FCI की नई नीति के दोहरे मानदंड पर सवाल उठने लगा है। जिसके लिए मोदी सरकार ठोस जवाब देने में विफल रही है।












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