नेताओं के पास रहता है प्लान बी तैयार

ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी कर्नाटक के बेल्लारी जिले के साथ ही साथ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का गढ़ रहे अमेठी से भी चुनाव लड़ेंगे। इससे पहले साल 1999 में उनकी मां और कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भी यही किया था। साल 1999 में दोनों जगहों से चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी ने बेल्लारी की सीट छोड़ दी थी।
पिछले कुछ लोकसभा चुनावों के दौरान वोटर्स दो सीटों से चुनाव लड़ने की परंपरा के गवाह बनते आ रहे हैं। दरअसल अगर इस परंपरा पर गौर किया जाए तो साफ पता चलता है कि पार्टियों की ओर से दो सीटों पर उम्मीदवार को खड़ा करना एक ऐसे गेम प्लान का हिस्सा है जिसमें वह अपनी जीत को पूरी तौर पर पक्का कर लेना चाहती हैं।
इसके लिए उन्हें संविधान की ओर से कानूनी मंजूरी भी मिली हुई है। रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट 1951 के सेक्शन 33 के तहत किसी भी व्यक्ति को अधिकतम दो सीटों से चुनाव लड़ने की मंजूरी मिली हुई है।
रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल एक्ट 1951 के सेक्शन 70 के तहत अगर कोई राजनेता दोनों ही सीटों पर चुनाव जीत लेता है तो उसे 10 दिनों के अंदर किसी एक सीट को छोड़नी पड़ती है और ऐसे में उस सीट पर उप-चुनाव कराए जाते हैं। लेकिन राजनीति और संविधान के जानकारों की मानें तो यह नियम आतर्किक है।
Did you know लोकसभा में चुनाव लड़ने की कीमत 10 लाख रुपए तक होती है
इतिहासकार और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष सी कश्यप की मानें तो कई नेता इस तरह की चुनावी प्रक्रिया का दुरुपयोग भी करते हैं। वह यह भी मानते हैं कि इस नियम से किसी भी तरह का मकसद पूरा नहीं होता।
हालांकि इस नियम से राजनेता उस रिस्क से बच सकते हैं जिसमें उन्हें इस बात का डर नहीं रहता कि अगर वह एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव हार गए तो फिर उनकी पार्टी या उनकी उम्मीदवारी का क्या होगा?
नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज के संजय कुमार की मानें तो किसी उम्मीदवार को एक से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की आजादी का मकसद वोटर्स और वोट्स के बड़े खजाने को सिर्फ अपनी पार्टी की ओर आकर्षित करना है क्योंकि जनता को इन चुनावों में हिस्सा लेना ही पड़ता है।
हालांकि वर्ष 2004 में चुनाव आयोग की ओर इस नियम में बदलाव करने का प्रस्ताव दिया गया था।
इस प्रस्ताव के तहत किसी भी उम्मीदवार के लिए सीट की संख्या को सिर्फ एक सीट तक ही सीमित करना था। इस नियम को मंजूरी नहीं दी गई थी। चुनाव आयोग की ओर से चुनावी प्रक्रिया में सुधार लाने की प्रक्रिया के तहत यह प्रस्ताव था। एक आरटीआई की मानें तो कांग्रेस पार्टी इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थी।
इसके अलावा 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दायर की गई। इस याचिका में कहा गया कि राजनेता इस नियम के तहत मिलने वाली छूट का फायदा उठाते हैं और जनता को उसका नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप करके इस पर रोक लगाए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर इस बारेमें कोई फैसला नहीं दिया गया है।
अभी लोकसभा चुनावों में हिस्सा लेने वाले नामों का आखिरी ऐलान बाकी है और यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि कितने व्यक्ति दो सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करते हैं।












Click it and Unblock the Notifications