यूपी में 17 OBC को SC में शामिल करने के पीछे योगी का क्या है सियासी दांव?

नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश की 17 अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के योगी आदित्यनाथ सरकार के फैसले को उपचुनाव से पहले का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। योगी सरकार ने इस एक फैसले से एक साथ कई सियासी निशाना साधने की कोशिश की है। इस फैसले पर प्रदेश के विपक्षी दल जिस तरह से प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं, उससे ही लगता है कि बीजेपी ने इन अति-पिछड़ी जातियों में बड़ा राजनीतिक संदेश तो पहुंचा ही दिया है।

14 फीसदी वोट बैंक पर बीजेपी की नजर

14 फीसदी वोट बैंक पर बीजेपी की नजर

मोटे तौर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में 17 अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी करने का राज्य सरकार का आदेश उनके 14 फीसदी वोट बैंक से जुड़ा हुआ है। यह इतना बड़ा वोट बैंक है, जिसे लुभाने की कोशिश तो पिछली सभी सरकारों ने की थी, लेकिन हाथ की सफाई दिखाने में मौजूदा बीजेपी सरकार कामयाब हो गई है। अलबत्ता, ये फैसला अभी भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के अधीन है, लेकिन इसने दूसरे दलों का राजनीतिक हिसाब-किताब तो अभी के लिए जरूर बिगाड़ दिया है। योगी आदित्यनाथ ने इस एक कदम से राज्य में सपा-बसपा की राजनीति का जातीय तोड़ निकालने की भी कोशिश की है, तो सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अलग होने से पैदा हुई खाई की भरपाई भी करने का प्रयास किया है।

14 फीसदी वोट बैंक का लेखा-जोखा

14 फीसदी वोट बैंक का लेखा-जोखा

जिन 17 अति-पिछड़ी जातियों के 14 फीसदी वोट की बात हो रही है, उनमें कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी और मछुआ शामिल हैं। लेकिन, इनमें से भी सबसे ज्यादा जनसंख्या निषादों की है, जो 10.25 फीसद हैं। उनके बाद 1.84 फीसद कुम्हार और 1.32 फीसद राजभर हैं। ये जातियां लंबे वक्त से अनुसूचित जातियों में शामिल करने की मांग कर रही थीं। यानी भाजपा को उम्मीद है कि उसने अब पूरी तरह से इन्हें अपने साथ कर लिया है। इनमें से निषाद 2018 के लोकसभा उपचुनाव को छोड़कर आमतौर पर बीजेपी समर्थक ही माने जाते रहे हैं। उधर बीजेपी ने ये सियासी चाल चलकर ओम प्रकाश राजभर की राजनीति को भी कुंद करने की कोशिश की है, जिन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी से मुंह फेर लिया था। वैसे 2014 के लोकसभा चुनावों से ही यूपी में ज्यादातर अति-पिछड़ों को बीजेपी का समर्थक ही माना जाता रहा है। ऐसे में बीजेपी ने उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करके उनपर अपने प्रभाव को और भी मजबूत बनाने की पहल की है।

बीजेपी को ऐसे भी मिल सकता है राजनीतिक फायदा

बीजेपी को ऐसे भी मिल सकता है राजनीतिक फायदा

योगी सरकार ने जिन 17 अति-पिछड़ी जातियों के लिए इतना बड़ा राजनीतिक फैसला लिया है, उनका अभी राजनीति में दबदबा बहुत ही कम है। अगर इन्हें अब अनुसूचित जाति को मिलने वाले आरक्षण का लाभ मिलेगा, तो यूपी की चुनावी राजनीति की फिजा ही बदल सकती है। मसलन, प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 17 और 403 विधानसभा सीटों में 86 सीटें रिजर्व हैं। अब इन जातियों को ऐसी सीटों से भी चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। जाहिर है कि अगर उनमें से ज्यादातर जनसंख्या अगर अभी भी बीजेपी के साथ है, तो बीजेपी मानकर चल रही है कि उसकी स्थिति और भी मजबूत हो सकती है। वहीं, इसका सबसे ज्यादा नुकसान बीएसपी एवं समाजवादी पार्टी को होने की आशंका है। इसलिए मायावती इस फैसले को असंवैधानिक बता रही हैं और आरोप लगा रही हैं कि बिना आरक्षण का कोटा बढ़ाए ये फैसला करना पूरी तरह से गलत है।

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