PM Modi oath ceremony: नरेंद्र मोदी गठबंधन सरकार कैसे चला सकेंगे? ये 'सोच' क्यों गलत है? 5 बड़ी वजहें
PM Modi Oath Ceremony News: एडीए की लगातार तीसरी बार की सरकार में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत नहीं मिला है तो एक बात बार-बार कही जा रही है कि क्या नरेंद्र मोदी गठबंधन की सरकार चला पाएंगे? क्योंकि, दो बार तो भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था। इस बार उन्हें गठबंधन सरकार की मजबूरियों से जूझना पड़ेगा।
यह कहानी चल रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव कहां है? वह 23 वर्षों से तो अपने दम पर गांधीनगर से दिल्ली तक भाजपा की बहुमत वाली सरकार चलाते रहे हैं। लेकिन, अगर हम नरेंद्र मोदी के पूरे व्यक्तित्व को देखें तो इस तरह की अटकलों, आशंकाओं में कोई दम नहीं है।

मास लीडर कभी नहीं बन सकते मोदी!
प्रधानमंत्री मोदी के पास गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव नहीं है तो वे चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के भरोसे पांच साल कैसे खेपेंगे? इस तरह की बातें सोशल मीडिया में खूब चल रही हैं। इसको लेकर फिल्म 'मिली' और 'जुली' की तस्वीरों के साथ मीम्स भी वायरल हुए हैं।
लेकिन, अगर नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की पड़ताल 1990 के दशक से करें तो ऐसी बातें करने वालों को झटका लग सकता है। 90 का दशक इसलिए, क्योंकि तब तक वह राजनीतिक विषयों में पूरी तरह से सक्रिय हो चुके थे। 'राम रथ यात्रा' में उनकी बहुत ही जोरदार भागीदारी रही।
उनको तब भी बहुत अच्छा संगठनकर्ता समझा जाता था। तब एक बात भाजपा और आरएसएस के सर्किल में भी प्रचलित थी कि नरेंद्र मोदी संगठन तक तो ठीक हैं, लेकिन इनके लिए मास लीडर बनना नामुमकिन है। लेकिन, आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में नरेंद्र मोदी से बड़ा कोई मास लीडर नहीं कहा जा सकता।
संगठन और सरकार चलाने में फर्क है!
2001 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आशीर्वाद से नरेंद्र मोदी को गुजरात में गुटबाजी में उलझी बीजेपी सरकार संभालने का मौका दिया गया तो यह सवाल उठे कि चुनाव लड़ना और लड़वाना मोदी के वश की बात नहीं!
उस समय यह नरेटिव चला कि गुजरात बीजेपी में जिस तरह से शंकर सिंह वाघेला और केशु भाई पटेल जैसे दिग्गजों की वजह से महासंग्राम मचा है, उसे संभालना इनके लिए बहुत मुश्किल है। मोदी कहां चुनाव लड़ पाएंगे और क्या पार्टी को जिता पाएंगे! लेकिन, मोदी गुजरात बीजेपी ही नहीं, गुजरात का चेहरा बन गए। सिर्फ भारत में ही नहीं, मोदी का नाम बहुत ही तेजी से पूरी दुनिया में स्थापित होने लगा।
उन्होंने पूरे 14 साल तक गुजरात में शासन किया। वह पार्टी और प्रदेश दोनों को अपने दम पर हैंडल करते रहे। उन्होंने देश में खुद को गुजरात के रूप में स्थापित किया और यही वजह रही है कि 2013 में भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया।
गुजरात और देश चलाने में फर्क है!
खैर जब 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री गांधीनगर से दिल्ली आकर देश के प्रधानमंत्री बने तो यह नरेटिव चलाया गया कि यह गुजरात नहीं है। मोदी कहां देश की राजनीति को संभाल पाएंगे! इस देश में स्थिति तो ऐसी भी रही ही कि सबसे बड़े विपक्षी दल के सबसे बड़े नेता ने दो-तीन वर्षों तक एक तरह से यह मानने के लिए तैयार ही नहीं दिखे कि मोदी उनकी नींद में आने वाला 'सपना' नहीं हैं,बल्कि वास्तव में देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं।
पीएम मोदी ने 10 साल तक देश चलाया। सारा विपक्ष इकट्ठे उनके खिलाफ जुटा रहा। लेकिन, वह उन सबका अपने दम पर सामना करते रहे। तरह-तरह के मोदी-विरोधी नरेटिव तैयार किए गए और तीसरी बार एनडीए को आगे से लीड करके सत्ता में वापसी करवा कर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करके विपक्ष की गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया।
वैश्विक राजनीति करना मोदी के लिए मुमकिन नहीं!
जब 2014 में मोदी सरकार बन गई और बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार चल पड़ी तो कहा जाने लगा कि दिल्ली तक तो ठीक है, वैश्विक राजनीति में ये कुछ नहीं कर पाएंगे। उसी साल पीएम मोदी संयुक्त राष्ट्र जनरल असंबेली में पहुंच गए और बता दिया कि वह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति भी बदलने आ गए हैं।
10 साल बाद स्थिति यह है कि भारत अपने हित देखकर ही कोई फैसले लेता है। दुनिया की कोई भी ताकत भारत को अपना नजरिया बदलने पर मजबूर नहीं कर सकता। दुनिया के तमाम बड़े देश किसी गंभीर विश्व व्यापी मसले पर पीएम मोदी की राय को गंभीरता से सुनने को मजबूर हैं। कई बार तो उनकी सलाह लेने में ही सबकी भलाई समझते हैं।
बहुत ही असाधारण है पीएम मोदी का व्यक्तित्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व को दो तरह से समझने की कोशिश करनी पड़ेग। वह बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी इंसान हैं। वह अपनी सोच सीधे थोपते नहीं हैं, वह लोगों को उसमें भरोसा करने के लिए तैयार करते हैं और तर्कों के आधार पर सहमति जुटाने की कोशिश करते हैं।
मौजूदा राजनीतिक हालात में जमीनी हकीकत ये है कि बगैर बीजेपी कोई भी सरकार पूरी तरह से नामुमकिन तो नहीं, लेकिन लगभग असंभव है। पीएम मोदी को पता है कि अगर गठबंधन सरकार चलाने का जनादेश उन्हें मिला है तो इससे मुंह फेर लेना अब नायडू और नीतीश के लिए भी आसान नहीं होगा।
इस साल आने वाले कुछ ही महीनों में तीन महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव होने हैं। उनमें से एक में बीजेपी की गठबंधन वाली और एक में अपनी सरकार है। विपक्षी दलों की तीसरी सरकार में कांग्रेस पार्टी भी सहयोगी है। महराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड की बात हो रही है।
अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बीजेपी इनमें से दो में भी फिर से सरकार बनाने में सफल हो गई तो मोदी को रोक पाना मुश्किल होगा। करीब चार दशकों के सियासी अनुभव की बदौलत न तो वह कोई ऐसा कदम उठाएंगे जिससे सहयोगी असहज हों, लेकिन अपना कोई एजेंडा भी नहीं छोड़ेंगे, जिसने उन्हें सफलता के शिखर तक पहुंचाया है।
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