म्यांमार के रास्ते चीन को एक और सबक सिखाने की तैयारी में मोदी
पीएम नरेंद्र मोदी म्यांमार दौरे पर हैं। इसे दक्षिण-पूर्वी एशिया का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। चीन ने इस देश में अरबों डॉलर का निवेश किया हुआ है। यह देश रणनीतिक दृष्टि से जितना चीन के लिए महत्वपूर्ण है, उतना ही भारत के लिए भी। आसान शब्दों में कहें तो म्यांमार में चीन का प्रभाव वैसा ही है, जैसा कि नेपाल में भारत का। नेपाल में लगातार भारत के प्रभुत्व को चुनौती दे रहे चीन को पीएम मोदी अब म्यांमार में चुनौती दे रहे हैं। यही कारण है कि चीन पीएम मोदी के दौरे पर पैनी नजर रखे हुए हैं।


चीन को उसी के स्टाइल में जवाब देने की तैयारी में मोदी सरकार
नेपाल के पीएम शेर बहादुर देऊबा कुछ दिनों पहले भारत दौरे पर आए थे। इस दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ देऊबा की गर्मजोशी से हुई मुलाकात चीन को अखर गई थी। डोकलाम विवाद के साए में देऊबा ने दोटूक संदेश देते हुए चीन को बता दिया था कि नेपाल के लिए भारत का महत्व क्या है। चीन ने भारत-नेपाल के करीबी संबंधों पर उस वक्त बेहद जलन भरी टिप्पणियां की थीं। यह बात किसी से छिपी नहीं कि नेपाल को अपने पाले में लाने के लिए चीन साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना रहा है। चीन ने नेपाल में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद वहां काफी पैठ बनाई है, लेकिन वह शायद भूल गया था कि वक्त का पहिया रुकता नहीं है। अब भारत सरकार म्यांमार में वही रणनीति अपनाने जा रही है, जो चीन बरसों से नेपाल में करता आया है।

भारत के लिए ज्यादा मुफीद हैं म्यांमार के राजनीतिक हालात
म्यांमार के मौजूदा राजनीतिक हालात भी कुछ ऐसे हैं, जो चीन की तुलना में भारत को ज्यादा रास आ रहे हैं। म्यांमार पर पांच दशक तक सैन्य शासन रहा। इस दौरान चीन-म्यांमार बेहद करीब आए। ड्रैगन को म्यांमार के सैन्य शासकों पर इतना भरोसा था कि उसने आंख बंद करके अरबों डॉलर का निवेश इस पड़ोसी देश में कर डाला, लेकिन वक्त बदला और वहां लोकतंत्र की बयार ऐसी चली कि म्यांमार की जनता ने सैन्य शासन को उखाड़ फेंका। 2016 में लोकतंत्र के लिए आंदोलन करने वाली नेता आंग सान सू की की पार्टी ने देश की सत्ता संभाली और उनके करीबी तिन क्या देश के राष्ट्रपति बने, सू ने विदेश मंत्री का पद संभाला। दरअसल, सैन्य शासकों के बनाए संविधान के अनुसार 70 वर्षीया सू राष्ट्रपति नहीं बन सकती थीं। यही कारण रहा कि उन्होंने विदेश मंत्री का पद संभाला। आंग सान सू ने दिल्ली में शिक्षा ग्रहण की और वह भारतीय नेताओं के बेहद करीब हैं।

म्यांमार-चीन संबंधों में चल रहा टकराव
म्यांमार में चीन के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। म्यांमार में चीन क्योक प्यू बंदरगाह भी बना रहा है, लेकिन आदत के मुताबिक, वह अपनी शर्तों को बदल रहा है। वह म्यांमार पर दबाव डाल रहा है कि उसे इस बंदरगाह की 70 से 85 फीसदी हिस्सेदारी मिले, जबकि पहले यह हिस्सेदारी 50-50 फीसदी तय की गई थी।

भारत-म्यांमार के बीच सुरक्षा सहयोग बेहद अहम
समुद्री सीमा के अलावा भारत के चार पूर्वोत्तर राज्यों के साथ 1,643 किलोमीटर की सीमा म्यांमार के साथ लगती है। आपको याद होगा कि मोदी सरकार बनने के बाद जिस पहली सर्जिकल स्ट्राइक की मीडिया में चर्चा हुई थी वह म्यांमार की सीमा में ही हुई थी। यहां कई भारत विरोधी समूहों ने अपने कैंप बना रखे हैं। म्यांमार की मौजूदा सरकार भारत से रिश्तों को कितना महत्व दे रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पीएम मोदी के दौरे से ठीक पहले म्यांमार की सेना ने कई आतंकी कैंपों पर कार्रवाई की।
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