'NOTA के वोट ज्यादा होने पर रद्द हो चुनाव', सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई जनहित याचिका

नई दिल्ली: चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें ये मांग की गई कि अगर NOTA के वोट ज्यादा पड़ते हैं, तो उस चुनाव को रद्द कर दिया जाए। साथ ही फिर से चुनावी प्रक्रिया को करवाया जाए। याचिका की बातों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया और उसे स्वीकार करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस भेज जवाब मांगा है। अगर सुप्रीम कोर्ट याचिकाकर्ता की मांगों को मानते हुए इससे संबंधित फैसला देगा, तो ये चुनाव प्रक्रिया में ऐतिहासिक सुधार होगा।

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    सुप्रीम कोर्ट

    ये याचिका बीजेपी नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय ने डाली थी, जबकि उनकी ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी कोर्ट में पहुंचीं। उन्होंने कहा कि 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता को NOTA यानी 'इनमें से कोई नहीं' पर वोट करने का अधिकार दिया था। वैसे NOTA का अधिकार तो जनता के पास है, लेकिन व्यवहारिक रूप से उनकी कोई अहमियत नहीं है, क्योंकि इसका चुनाव परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ता। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि अगर किसी चुनाव में 99 प्रतिशत वोट NOTA को जाते हैं और एक प्रतिशत वोट प्रत्याशियों को, तो एक प्रतिशत के आधार पर प्रत्याशी की जीत तय हो जाएगी।

    मेनका गुरुस्वामी ने आगे कहा कि अगर कोर्ट चाहे तो वो NOTA के वोट प्रतिशत को तय कर सकता है। जैसे अगर 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट NOTA के पड़े, तो चुनाव को रद्द कर दिया जाए। इस याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमण्यन की पीठ कर रही थी। जिस पर उन्होंने कानून मंत्रालय और चुनाव आयोग को इससे संबंधित नोटिस जारी किया है। सुनवाई को दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि मान लीजिए बहुत सी सीटों पर NOTA की वजह से चुनाव रद्द करना पड़ गया, तो सरकार का गठन कैसे होगा।

    'दोबारा वोटिंग की हो व्यवस्था'
    चीफ जस्टिस के सवाल पर याचिकाकर्ता की वकील ने कहा कि जहां पर चुनाव रद्द हों, वहां पर तुरंत दोबारा से वोटिंग करवाने की व्यवस्था की जाए। साथ ही राजनीतिक पार्टियां वहां पर अपने उम्मीदवारों को दोबारा लड़ने की इजाजत ना दें, क्योंकि जनता ने उन्हें खारिज कर दिया है। इस पर पीठ ने कहा कि याचिका में जो सवाल उठाए गए हैं, वो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इस वजह से सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा गया। जवाब के आधार पर आगे की सुनवाई होगी।

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