हुदहुद, फेलिन, कैटरीना.... कौन डिसाइड करता है चक्रवात के नाम?
[अजय मोहन] चक्रवात हुदहुद अपने साथ 170 से 200 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से तेज हवाएं और भारी बारिश लेकर आया है। यह चक्रवात भारत से टकरा चुका है और तबाही का दौर अब शुरू हो चुका है। हस चक्रवात के चलते भारी मात्रा में फंसलें नष्ट हो जायेंगी और एक और बर्बादी की कहानी लिखेगा यह हुदहुद। हर तरफ इस वक्त इसी हुदहुद की चर्चा है। यह नाम भी आपको शायद हमेशा याद रहेगा। लेकिन क्या आपने सोचा है कि हुदहुद, फेलिन, लैला, जैसे चक्रवात व तूफानों के नाम कौन डिसाइड करता है?
अगर इन सवालों के उत्तर जानने की जिज्ञासा आपके अंदर है, तो आप आगे जरूर पढ़ें। हमने इस संबंध में लखनऊ विश्वविद्यालय के एडवांस लर्निंग सेंटर ऑफ जियोलॉजी के प्रो. ध्रुव सेन सिंह से बात की। उन्होंने बताया कि हर साल पूरी दुनिया में 100 से ज्यादा चक्रवात बनते हैं, उनमें कई कम तीव्रता वाले होते हैं, जो एक दो दिन में समुद्र में ही समाप्त हो जाते हैं और कुछ फेलिन जैसे होते हैं, यानी बेहद तीव्र। बात अगर नाम की करें तो चक्रवात अगर अटलांटिक महासागर से उठा है, तो उसे हरिकेन कहा जायेगा और अगर भारतीय महासागर में तो इसे साइक्लोन कहा जाता है।
डा. सिंह के अनुसार प्रत्येक चक्रवात का नाम उस देश का मौसम विभाग तय करता है, जहां से चक्रवात उठता है। जैसे अगर आप फेलिन को ले लीजिये, यइ थाईलैंड की समुद्री सीमा में उठा, तो उसका नाम भी थाईलैंड के मौसम विभाग ने दिया। वहीं पिछले दिनों भारतीय महासागर में लैला आया था, उसे पाकिस्तान के मौसम विभाग ने नाम दिया था।
क्यों रखते हैं नाम
डा. सिंह के अनुसार 1945 के पहले तक किसी भी चक्रवात का कोई नाम नहीं होता था, लिहाजा मौसम वैज्ञानिकों व भूवैज्ञानिकों को बहुत दिक्कत होती थी। जब वो अपने अध्ययन में किसी चक्रवात का ब्योरा देते थे, या चर्चा करते थे, तब वर्ष जरूर लिखना होता था और अगर वर्ष में थोड़ी सी भी चूक हो गई, तो सारी गणित बदल जाती थी। इसी दिक्कत से निबटने के लिये 1945 से विश्व मौसम संगठन ने चक्रवातों को नाम देने का निर्णय लिया और तब से अब तक जितने भी चक्रवात आये उन्हें अलग-अलग नाम दिये गये हैं।
डा. सिंह ने बताया कि इसके पीछे अन्य उद्देश्य यह हैं कि इससे लोग लंबे समय तक चक्रवात को याद रखते हैं। चक्रवात पर रिपोर्ट तैयार करने में कोई दिक्कत नहीं होती, लोगों को चौकन्ना करने में भी आसानी होती है। इसका नाम कभी भी एल्फाबेटिक ऑर्डर में नहीं होता, और न ही किसी व्यक्ति विशेष या वैज्ञानिक के नाम पर रखा जाता है। यह वो नाम होता है, जो लोगों के बीच बहुत प्रचलित हो, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उस नाम को याद रख सकें और आसानी से समझ सकें।
कौन तय करता है नाम?
अलग-अलग देशों के मौसम विभाग द्वारा प्रस्तावित चक्रवातों के नाम तय करने के लिये दुनिया भर में अलग-अलग समितियां हैं- इस्केप टाइफून कमेटी, इस्कैप पैनल ऑफ ट्रॉपिकल साइक्लोन, आरए 1 ट्रॉपिकल साइक्लोन कमेटी, आरए 4 और आरए 5 ट्रॉपिकल साइक्लोन कमेटी। असल में यही कमेटियां दुनिया भर के अलग-अलग स्थानों पर आने वाले चक्रवातों पर नजर भी रखती हैं।
भारतीय महासागर में आने वाले कुछ चक्रवातों के नाम
जो इस्तेमाल किय जा चुके हैं- जाल, ओनिल, निशा, गिरी, हिबारु, आइला, केइला, थाने, फयान, बाज, नरगिस, बंधु, रश्मि, मुक्दा, माला, फेट, फनूस, फेलिन, हुदहुद आदि।
भविष्य के लिये प्रस्तावित नाम- हेलन, चपाला, ओखी, फनी, लहर, मेघ, सागर, वायु, माडी, रोआनु, मकेनू, नानौक, कयांत, कयार, महा, लुबान, प्रिया, नीलोफर, वरधा, तितली, बुलबुल, मोहरार, उमपुन, अम्फन, पेयती, मोरा, आदि।
अटलांटिक महासागर में हरिकेन के प्रस्तावित नाम- ली, लीजा, गैब्रिएला, काटिया, ओट्टो, रिचार्ड, वाइना, मेलिसा, विलफर्ड, क्रिस, डैबी, जूलिया, फिओना, आदि।
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