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कंगाल कांग्रेस सत्ता के लिए बागियों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रही है!

बेंगलुरू। राष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह से दरकिनार हो चुकी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अब बागियों के सहारे राज्यों की सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना रही है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में चौथे नंबर पर ही कांग्रेस ने महाराष्ट्र में एनडीए सहयोगी रही शिवसेना के बागी होते ही सरकार बनाने की कवायद में जुट जाना महज एक बानगी नहीं है। कर्नाटक और हरियाणा भी इसके ज्वलंत उदाहरण है।

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कांग्रेस और शिवसेना परस्पर विरोधी पार्टियां हैं, लेकिन सत्ता के लिए कांग्रेस ने वसूलों और विचारधाराओं की परवाह नहीं की और शिवसेना के साथ कंधे-से कंधा मिलाकर महाराष्ट्र की सत्ता का स्वाद चखने के लिए आतुर हैं। कांग्रेस के बदले मनोदशा के लिए एक तरह जहां पार्टी का सिकुड़ता वर्चस्व है, जिससे पार्टी फंड की हालत बुरी हो गई है जबकि दूसरा कारण चुनाव दर चुनाव में कांग्रेस की लगातार हार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

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इसमें दो राय नहीं है कि 134 वर्ष पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की हालत बेहद पतली है। कभी दो तिहाई से अधिक राज्यों में सत्ता में रहने वाली कांग्रेस वर्तमान में 4 राज्यों में सिमटी हुई है। महाराष्ट्र में एनसीपी के नेतृत्व में कांग्रेस शिवसेना के साथ गठबंधन में शामिल होने की दहलीज पर है। महाराष्ट्र की सत्ता में शामिल होते ही कांग्रेस कुल 5 राज्यों में उसकी सरकार हो जाएगी।

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इनमें छत्तीसगढ़, राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस अपने बूते पर सरकार में कायम है, लेकिन मध्य प्रदेश में सरकार बनाने के लिए उसे बैसाखियों की जरूरत पड़ गई। वहीं, महाराष्ट्र में सत्ता तक पहुंचने के लिए सेक्युलिरज्म को चोला भी उतारकर फेंकना पड़ा, जिसका वो खुद को बड़ा लंबरदार मानती और बताते नहीं थकती है।

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कांग्रेस की मौजूदा हालात के लिए कांग्रेस की चुनाव दर चुनाव में हार है। कांग्रेस वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से लगातार हार का सामना कर रही है। वर्ष 2017 में उसके लिए सुकूंन का पल आया जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही, लेकिन तब तक कांग्रेस केंद्र से लेकर देश के अंधिकांश राज्यों सत्ता गंवा चुकी थी, जिसकी कांग्रेस की हालत डांवा-डोल हो चुकी थी।

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केंद्र और राज्यों से सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस की पार्टी फंड में चंदा भी कम आने लगा, जिससे कांग्रेस कंगाली के दौर से गुजरने लगी। हालांकि वर्ष 2018 में हुए तीन विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए मोहलत लेकर आई और कांग्रेस बीजेपी शासित तीन राज्यों में पुनर्वापसी करने में कामयाब हुई, लेकिन पार्टी की माली हालत में ज्यादा सुधार नहीं हुआ।

वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव से पूर्व देश के राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिए हलफनामें के मुताबिक बीते एक वर्ष में बीजेपी की कमाई 81 फीसदी के दर से बढ़ी थी, लेकिन कांग्रेस की कमाई में 14 फीसदी की गिरावट दर्ज की थी। बीजेपी की कमाई बढ़ने के लिए जहां देश के कई राज्यों में पार्टी की सरकार बनना है।

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वहीं, कांग्रेस को हुए नुकसान की वजह कई राज्यों में उसके राजनीतिक रसूख में गिरावट दर्ज होना बताया जा रहा है। इसके अलावा बीजेपी की कमाई में वृद्धि बीजेपी शासित राज्यों की संख्या में लगातार इजाफा है, जिससे पार्टी की कमाई पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी हो चुकी है।

एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कंगाल हो चुकी कांग्रेस पार्टी में फंड की इतनी दिक्कत है कि कांग्रेस नेतृत्व ने कई राज्यों में पार्टी कार्यालयों को संचालित करने के लिए जरूरी पैसा भी रोक दिया गया था। कांग्रेस के एक अधिकारी के मुताबिक पैसों की तंगी के चलते कांग्रेस की ओर से खर्चों को कम करने और मदद के लिए आगे आने की अपील की गई है।

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लोकसभा चुनाव 2019 में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस के पास उद्योगपतियों की ओर आने वाले चंदे में भी काफी कमी दर्ज की गई है। यही कारण था कि नकदी की समस्या से जूझ रही कांग्रेस को प्रत्याशियों की मदद के लिए अब जनता के चंदे के पैसा का सहारा लेना पड़ा था।

वर्ष 2017 की बात करें तो कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले मात्र चौथाई धन प्राप्त हुआ था। एक ओर बीजेपी ने जहां 10.34 अरब रुपए की आय की घोषणा की थी, इसी दौरान कांग्रेस को मात्र 2.25 अरब रुपए का फंड प्राप्त हुआ था। कांग्रेस की कंगाली और भयावहता का दर्शन कांग्रेस के दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कार्यालय करता है, जहां महीनों से बिजली बिल बकाया है। यहां तक कि कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों को वेतन भी नहीं दिया गया।

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पिछले दिनों दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित के निधन के बाद उनकी याद में शोक सभा का आयोजन किया गया था, उस मद में आए 5 लाख रुपये का बिल भी अभी तक बकाया ही है। यही कारण है कि बदहाली से जूझ रही कांग्रेस सत्ता तक पहुंचने के लिए बागियों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रही है।

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महाराष्ट्र से पहले कांग्रेस ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी त्रिशंकु जनादेश की स्थिति में सरकार बनाने के लिए रस्साकसी शुरू कर दी थी। कांग्रेस ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 में किंग मेकर की भूमिका में सामने आए नवोदित जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के साथ सरकार बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी थी।

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यह ठीक वैसा ही था जब कांग्रेस ने कर्नाटक में एचडी कुमारास्वामी के साथ सरकार बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन की घोषणा की थी और बाद में सरकार में भी शामिल हो गई थी। हालांकि 14 महीने बाद कांग्रेस और जेडीएस सरकार सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस में सत्ता की सनक ही कहेंगे कि उसने हरियाणा में भी वही दांव खेला, लेकिन बीजेपी ने जेजेपी अध्यक्ष दुष्यंत चौटाला को अपने पाले में ले आई और हरियाणा में दोबारा सरकार बनाने में सफल रही।

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महााराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना गठबंधन सरकार कल यानी 28 नवंबर को शपथ ले सकती है। महाराष्ट्र में नंबर वन पार्टी बनकर उभरी बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने में कामयाब हुई कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के साथ सत्ता का स्वाद चखने को तैयार है। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस को गठबंधन सरकार में कांग्रेस के 9 नेता सरकार में मंत्री बन सकते हैं।

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कहा जा रहा है कि संभावित गठबंधन सरकार में एक मुख्यमंत्री और दो डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। यानी चौथे नंबर की पार्टी कांग्रेस को शिवसेना जैसी परस्पर विरोधी विचारधारा वाली पार्टी के साथ गठबंधन करके डिप्टी सीएम के साथ-साथ 9 मलाईदार मंत्रालय भी हासिल हो रहा है और बीजेपी नंबर एक पार्टी होकर विपक्ष में बैठेगी।

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उल्लेखनीय है कांग्रेस लगातार बीजेपी पर नैतिकता और लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाती रहती है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र में अवसरवादी सरकार में शामिल होकर कांग्रेस ने साबित कर दिया है कि उसके खाने के और दिखाने के दांत दोनों अलग हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार में शामिल होकर साबित कर दिया है कि वह सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है और किसी भी दल के साथ समझौता करने के लिए तैयार है।

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अगले माह झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस ने झारखंड में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं किया है, लेकिन यह तय है कि अगर झारखंड में त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति पैदा हुई तो सबसे पहले कांग्रेस ही वह पार्टी होगी जो किसी भी दल को बिना शर्त समर्थन देने के लिए हाथ बढ़ाएगी।

यह भी पढ़ें- 'एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना सबसे निकम्मी और भ्रष्ट सरकार भी साबित हो सकती है'

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