बैकफुट पर क्यों आया विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A.? चुनावों से पहले विशेष संसद सत्र के लिए बदलनी पड़ी रणनीति
Parliament Special Session 2023: सोमवार से शुरू हुए संसद के पांच दिवसीय विशेष सत्र को लेकर विपक्षी दल अभी तक आशंकित बने हुए हैं। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि आखिरी वक्त पर मोदी सरकार कौन सा ऐसा दांव चल दे, जिससे संभल पाना उसके लिए मुश्किल हो जाए। इसलिए इस बार वह काफी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक ने इसी वजह से तय किया है कि वह दोनों सदनों की सारी कार्यवाही को गंभीरता से लेंगे और पूरी प्रक्रिया के दौरान उनके सांसद सदन में मौजूद रहेंगे। इंडिया ब्लॉक में शामिल पार्टियों ने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि इन पांच दिनों में उनके सदस्य ऐसी कोई गलती ना करें, जिससे सदन से निलंबन की तलवार लटक जाए।

पिछली गलतियां नहीं दोहराएगा विपक्ष?
सोमवार को राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के संसद भवन में मौजूद चैंबर में इसी बात को लेकर इंडिया ब्लॉक में शामिल दलों के सदन के नेताओं की एक बैठक भी हुई। इसमें यहां तक तय किया गया कि अगर सत्ता पक्ष की ओर से उकसावे की भी कोशिश होती है, तब भी विपक्षी पार्टियों के सांसद उतावले नहीं होंगे और ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएंगे, जिससे सदन से निलंबित होने का खतरा पैदा हो जाए।
पिछले सत्रों में कई बार बने अप्रिय हालात
दरअसल, पिछले कम से कम दो सत्रों के दौरान विपक्षी दलों ने दोनों सदनों में खूब हंगामा काटा था। कई बार पीठासीन अधिकारी को सदन की कार्यवाही के शांतिपूर्ण संचालन के लिए सदस्यों के निलंबन जैसे कदम उठाने पड़ गए। खासकर बजट सत्र के दूसरे हिस्से में और बीते मानसून सत्र के दौरान ऐसी अप्रिय स्थितियां कई बार पैदा हुई हैं, जब सदस्यों ने अपनी गरिमा के दायरे को लांघने की कोशिश की।
राज्यसभा में सरकार का काम हो जाता है आसान
विपक्षी दलों ने देखा है कि इसकी वजह से राज्यसभा के कुछ सांसदों का निलंबन भी हुआ है। गौर करने वाली बात है कि ऊपरी सदन में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं है। महत्वपूर्ण विधेयकों को पास कराने के लिए उसे बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस समेत कुछ न्यूट्रल पार्टियों के सहयोग का सहारा लेना पड़ता है।
लेकिन, अगर ऐसी स्थिति में विपक्षी दलों के सांसद का निलंबन हो जाता है तो सरकार के लिए बहुमत का आंकड़ा जुटाना ज्यादा आसान हो जाता है। यही नहीं कई बार जरूरी विधेयकों को बिना किसी चर्चा के ही हंगामें के बीच में ही ध्वनिमत से पास कराने का अवसर भी मिल जाता है, जिससे विपक्ष को कोई फायदा तो नहीं होता, बल्कि वह अपनी बात भी नहीं रख पाता है। ऊपर से सरकार चर्चा से भागने का आरोप भी लगाने में देरी नहीं करती।
देर आए दुरुस्त आए?
इसी साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों की उलटी गिनती भी इसी सत्र के साथ शुरू हो रही है और सरकार के एजेंडे में चुनाव ही इसका आखिरी लक्ष्य लग रहा है। ऐसे में विपक्ष यह समझ गया है कि अब बायकॉट वाली रणनीति से कोई फायदा नहीं मिलने वाला जो कहना है, बहस में हिस्सा लेकर ही कहने में ज्यादा फायदा है। कम से कम इसके माध्यम से वह अपनी बात तो जनता तक पहुंचा सकता है।
मानसून सत्र में विपक्ष की रणनीति हुई थी फेल
पिछले सत्र में भी देश देख चुका है कि मणिपुर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में जवाब मांगने के लिए विपक्ष ने कितना हंगामा किया था। लेकिन, सरकार की रणनीति इतनी सटीक थी कि जब पीएम मोदी अपने अंदाज में संसद में बयान दे रहे थे तो विपक्षी बेंच खाली पड़े हुए थे।
उन्होंने पीएम मोदी के मुद्दे भाषण के दौरान उनके मुद्दे पर आने तक का धैर्य नहीं दिखाया और सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर गए। विपक्ष की पूरी रणनीति को सरकार के ऐक्शन ने आफत को अवसर में बदलने का काम किया और वह अपनी जो भी बात रखना चाहती थी, बहुत ही सधे हुए अंदाज में देश के सामने रख दिया।












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