ओबीसी संविधान संशोधन: बीजेपी का चुनावी वार या मिली विपक्ष को धार
ऐसा कम ही देखा गया है कि किसी विधेयक को पारित करने के लिए सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच कोई वाद-विवाद न हो और विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो जाए. ऐसा होना तब और भी मुश्किल होता है जब सरकार और विपक्ष के बीच संसद में भारी गतिरोध चल रहा हो.
लेकिन 10 अगस्त की शाम लोकसभा में ऐसा ही नज़ारा देखा गया जब संसद के निचले सदन में 127वाँ संविधान संशोधन विधेयक सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की अपनी सूची की पहचान करने और उसे नोटिफ़ाई करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की शक्ति को दोबारा बहाल करना है.
केंद्र सरकार के अनुसार राज्यों की शक्ति को बहाल करने का सीधा लाभ उन 671 जातियों को मिलेगा जिनकी राज्य सूचियों में की गई अधिसूचना के रद्द होने का ख़तरा था.
2022 की शुरुआत में ही गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड, पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और इस विधेयक के सर्वसम्मति से पारित होने का मतलब यही निकला जा रहा है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी ओबीसी श्रेणी के मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहती.
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क्या है ओबीसी से जुड़ा नया संशोधन?
2018 में संसद ने संविधान में 102वां संशोधन पारित किया था जिसमें संविधान में तीन नए अनुच्छेद शामिल किए गए थे. नए अनुच्छेद 338-बी के ज़रिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया. इसी तरह एक और नया अनुच्छेद 342ए जोड़ा गया जो अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची से संबंधित है. तीसरा नया अनुच्छेद 366(26सी) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को परिभाषित करता है.
इस अधिनियम के पारित होने के बाद यह सवाल उठा कि क्या संविधान में किए गए संशोधनों का मतलब यह है कि ओबीसी की एक केंद्रीय सूची होगी जो प्रत्येक राज्य के लिए ओबीसी को नामित करेगी. इसने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें राज्यों की ओबीसी की अपनी सूची तैयार करने और बनाए रखने की शक्ति के बारे में भ्रम पैदा हुआ.
इसी साल 5 मई को मराठा समुदाय के लिए एक अलग कोटा देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान में 2018 के संशोधन के बाद केवल केंद्र सरकार ही किसी समुदाय को ओबीसी नोटिफ़ाई कर सकती है और राज्य सरकारों के पास यह अधिकार नहीं है.
संसद से पारित ताज़ा संशोधन का उद्देश्य यही स्पष्ट करना है कि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को ओबीसी की अपनी सूची तैयार करने और बनाए रखने का अधिकार है. सरकार ने कहा है कि ऐसा "इस देश के संघीय ढांचे को बनाए रखने की दृष्टि से" किया गया है.
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'छोटी संख्या वाली जातियों को फायदा होगा'
बीबीसी ने इलाहाबाद स्थित गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर बद्री नारायण से इस विषय पर बात की.
प्रोफेसर नारायण कहते हैं कि नया अधिनियम "एक सही निर्णय है जो लोकतंत्र को मज़बूत करेगा" चूँकि इसमें "निर्णय लेने की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत कर दिया गया है".
वे कहते हैं, "राज्य जनता के ज़्यादा करीब होते हैं. वो समुदाय जो ओबीसी सूची में आने की ख्वाहिश रखते हैं उनके बारे में राज्यों के पास ज़्यादा जानकारियां और आँकड़े होते हैं. इस क़ानून का सामाजिक असर ये होगा कि बहुत-सी छोटी संख्या वाली जातियां जो विकास में काफी पीछे रह गई हैं अब ओबीसी लिस्ट में शामिल होंगी और उन्हें इसका फायदा होगा."
प्रोफेसर बद्री नारायण कहते हैं कि अगर प्रभावी जातियाँ ओबीसी लिस्ट में आएँगी तो ये देखना होगा कि उन्हें तो फायदा होगा ही लेकिन उनके ओबीसी में शामिल होने का नुक़सान किसी और को न हो. उनके अनुसार इस बात का ख्याल रखना होगा क्योंकि प्रभावी जातियों के पास प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता है.
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आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा का मसला
संसद में पारित कानून ने राज्यों की ओबीसी लिस्ट बनाने की शक्तियाँ बेशक बहाल कर दी हैं लेकिन विपक्षी पार्टियों की मांग है कि सरकार क़ानूनी कदम उठाकर आरक्षण पर 50 प्रतिशत की तय सीमा को समाप्त कर दे.
10 अगस्त को 127वें संविधान संशोधन विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने लोकसभा में कहा कि कई लोकसभा सदस्यों ने आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाने की मांग की है, इसकी सावधानी से जांच करने की आवश्यकता है क्योंकि इसमें संवैधानिक मुद्दे शामिल हैं.
इस विधेयक पर हुई चर्चा में कई सांसदों ने कहा कि इस संविधान संशोधन के ज़रिए केंद्र सिर्फ़ अपनी उस गलती को सुधार रहा है जो 102वें संविधान संशोधन के दौरान राज्यों की शक्तियों को छीनकर उसने की थी.
इस नए अधिनियम के आलोचक यह भी कह रहे हैं कि ये मात्र एक राजनीतिक फैसला है जिससे समुदायों को ओबीसी का दर्जा देकर आरक्षण मुहैया करने की बात राज्यों के पाले में चली जाएगी. अब चूँकि राज्य आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा नहीं तोड़ सकते इसलिए यह मांग ज़ोर पकड़ रही है कि इस सीमा को ख़त्म करने का काम केंद्र को करना चाहिए.
मौजूदा निर्देशों के अनुसार प्रतियोगिता परीक्षा के ज़रिए अखिल भारतीय स्तर पर भर्तियों में अनुसूचित जाति (एससी) को 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है. खुली प्रतियोगिता के अलावा अखिल भारतीय स्तर पर सीधी भर्ती में अनुसूचित जातियों के लिए 16.66 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 25.84 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित किया गया है.
किसी भी हालत में राज्यों को आरक्षण देते वक़्त 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है और जब भी राज्यों ने इस सीमा को लांघा है तो अदालतों ने उन फैसलों को रद्द किया है.
ओबीसी का दर्जा और राज्य सरकारें
पिछले कुछ सालों में देश के कई राज्यों में समुदायों ने ओबीसी में शामिल किए जाने की मांग उठाई है. इन मांगों का मुख्य उद्देश्य ओबीसी कोटा के तहत आरक्षण पाकर नौकरियां हासिल करना ही रहा है.
हरियाणा में जाट, महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के लोगों की हाल के वर्षों में ओबीसी में शामिल किए जाने की मांग काफी चर्चा में रही है. इनमें से कुछ समुदायों ने ओबीसी में शामिल किये जाने की मांग पर हिंसक संघर्ष का रास्ता भी अपनाया.
कई समुदायों के ओबीसी लिस्ट में शामिल किए जाने की मांग के जायज़ होने पर भी सवाल उठते रहे हैं. उदाहरण के तौर पर जाटों को देश के एक समृद्ध और प्रभावशाली समुदाय के रूप में देखा जाता है और कई बार ये बात उठती है कि क्या उन्हें पिछड़ा वर्ग माना जा सकता है. इसके बावजूद जाट कई राज्यों की ओबीसी सूची में शामिल हैं. इसी तरह के तर्क पटेल और मराठा समुदाय के लोगों को ओबीसी में शामिल करने के ख़िलाफ़ भी दिए जाते हैं.
2015 में सुप्रीम कोर्ट ने जाटों को नौ राज्यों में ओबीसी श्रेणी की केंद्रीय सूची में शामिल करने के केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "जाति" और "ऐतिहासिक अन्याय" किसी समुदाय को पिछड़ा दर्जा देने का कारण नहीं हो सकते.
जाति आधारित जनगणना
चूंकि राज्यों की ओबीसी सूची बनाने की शक्ति बहाल हो गई है इसलिए जाति आधारित जनगणना करवाने की मांग भी फिर से ज़ोर पकड़ रही है क्योंकि देश में ओबीसी श्रेणी में आने वाले लोगों के बारे में कोई भी आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
2018 में गृह मंत्रालय ने कहा था कि 2021 में होने वाली जनगणना या सेन्सस में ओबीसी श्रेणी के बारे में डेटा एकत्रित किया जाएगा. लेकिन 2019 में गृह मंत्रालय के अनाम अधिकारियों के हवाले से यह खबर आई कि इस तरह का कोई फैसला नहीं किया गया है.
20 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा कि सरकार ने एक नीतिगत फैसले के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य जाति के आधार पर जनसंख्या की गणना नहीं करने का निर्णय लिया है.
कोविड-19 महामारी के प्रकोप की वजह से इस साल की जाने वाली जनगणना गतिविधियों को स्थगित कर दिया गया है.
समाजवादी पार्टी और तेलुगु देशम पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ एनडीए के अपने सहयोगी दल जैसे जनता दल (यू) और अपना दल मांग कर रहे हैं कि जाति आधारित जनगणना की जानी चाहिए. डीएमके जैसी पार्टियां मांग कर रही हैं कि सरकार को 2011 में आयोजित सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) से डेटा जारी करना चाहिए.
राजनीतिक असर
जिस तरह से संसद में चल रहे गतिरोध के बावजूद सभी पार्टियां इस विधेयक पर एक साथ आईं, ये साफ़ है कि इस प्रकरण के राजनीतिक महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता.
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद मोदी सरकार में अब 27 मंत्री ओबीसी श्रेणी के हैं. इनमें से पांच कैबिनेट मंत्री हैं. बीजेपी इस बात को पूरी तरह भुनाने की तैयारी में है.
11 अगस्त को भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने ओबीसी पृष्ठभूमि से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए गए मंत्रियों का एक बड़े आयोजन के तहत अभिनंदन किया.
ख़बरों की मानें तो ओबीसी श्रेणी के केंद्रीय मंत्रियों को "लोगों का आशीर्वाद लेने के लिए" इसी महीने एक आशीर्वाद यात्रा निकालने के लिए कहा गया है. इस यात्रा के ज़रिये इन मंत्रियों का काम पिछड़ी जातियों के हित में मोदी सरकार ने जो काम किए हैं उनका बखान करना होगा.
प्रोफेसर नारायण कहते हैं, "जो भी राजनीतिक दल जातियों को ओबीसी दर्जा देगा उसे उसका फायदा मिलेगा. अगर बीजेपी ऐसा करती है तो उसे इसका फायदा मिलेगा. लेकिन और पार्टियां भी यहां से अपनी राजनीतिक जगह तलाशेंगी क्योंकि वो इस मांग के साथ खुद को जोड़कर रखती रही हैं. कई राजनीतिक पार्टियां भी ओबीसी वर्ग में अपना समर्थन आधार बनाना चाहेंगी. सभी के लिए एक राजनीतिक मौका बनेगा."
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