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Parliament Attack: 5 सेकेंड की देरी और दहल जाता हिंदुस्तान! निहत्थी कमलेश ने ऐसे फेल किया आतंकियों का प्लान

Parliament Attack: 13 दिसंबर 2001 की वह सर्द सुबह भारत के इतिहास में 'काला दिन' बन सकती थी। दिल्ली के संसद भवन के गलियारों में जब चुने हुए नेता लोकतंत्र का जिम्मा अपने कांधों पर संभाले हुए थे, ठीक उसी समय गेट नंबर 1 पर, मौत एक सफेद एम्बेसडर कार में तेजी से आ रही थी।

अराजकता और लोकतंत्र के बीच की उस पतली रेखा पर, एक महिला चुपचाप खड़ी थी- कोई बड़ी अधिकारी नहीं, कोई प्रसिद्ध चेहरा नहीं, बल्कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की एक साधारण कांस्टेबल, जिनका नाम था कमलेश कुमारी यादव। अगले कुछ ही क्षणों में, उन्होंने अपनी जान की आखिरी बूंद देकर यह सुनिश्चित कर दिया कि भारत का लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं कि कोई भी इसे हिला सके। उन्होंने आतंकियों के मनसूबों को धूल में मिला दिया।

constable kamlesh kumari

यह वह सुबह थी जब एक मां अपनी बेटी को स्वेटर पहनने की याद दिलाकर ड्यूटी पर लौटी थी, और यही उनकी अपने पति से आखिरी बातचीत साबित हुई। सुबह लगभग 11:40 बजे, कमलेश संसद भवन के गेट नंबर 1 पर तैनात थीं, जो परिसर में प्रवेश का महत्वपूर्ण प्वाइंट था।

तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही थी एम्बेसडर कार
उन्होंने देखा कि एक सफेद एम्बेसडर कार आगे की ओर बढ़ रही है। कार पर नकली संसद स्टीकर लगे थे। इसके अलावा कार पर एक लाल बत्ती का भी उपयोग किया गया, ताकि किसी को जरा भी संदेह न हो सके। कार तेजी से अंदर की ओर आ रही थी। कमलेश को ये आभास होने में देर नहीं लगी कि आगे बढ़ रही कार में सबकुछ ठीक नहीं है।

कमलेश के रूप में खतरा देखते ही आतंकियों ने चला दीं गोलियां
उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर कार को रोकने का प्रयास किया और चिल्लाना शुरू कर दिया। कार में बैठे लोगों (आतंकियों से) पहचान पत्र मांगा। आतंकियों ने कमलेश के चिल्लाने पर तुरंत गोलियां चलानी शुरू कर दीं।

11 गोलियों का किया सामना
गोलियों की बौछार शुरू होते ही कमलेश ने न तो आत्मसमर्पण किया और न ही पीछे हटीं। आतंकियों की ताबड़तोड़ फायरिंग के बावजूद, वह अपनी जगह डटी रहीं। उन्हें ग्यारह गोलियां लगीं। गिरने से पहले, उन्होंने एक चीख लगाई- जो सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि सतर्कता का अलार्म थी। उनकी चीख ने उनके साथी जवानों और सुरक्षाकर्मियों को तुरंत खतरे का संकेत दे दिया।

कमलेश ने गोलियों से छलनी होने के बाद जो साहस दिखाया उसने बहुत कुछ होने से बचा लिया। कमलेश की चीख अन्य सिक्योरिटी पर्सन तक पहुंच गई और तुरंत संसद के सुरक्षा द्वार बंद कर दिए गए। इस दौरान अंदर मौजूद सैकड़ों सांसदों, नेताओं और कर्मचारियों को सुरक्षित स्थानों पर निकाला जा सका।

यह एक ऐसा पल था जिसने भारत के सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहार को टाल दिया। कमलेश कुमारी यादव मौके पर ही शहीद हो गईं, लेकिन उन्होंने देश को बचा लिया।

विरासत और सम्मान
खुफिया जानकारी ने बाद में पुष्टि की कि आतंकियों की योजना परिसर के अंदर जाकर हथगोलों और विस्फोटकों का उपयोग करके बड़े पैमाने पर नरसंहार करने की थी, लेकिन वे कमलेश के कारण सफल नहीं हो पाए।

मरणोपरांत अशोक चक्र से किया सम्मानित
26 जनवरी 2002 को, कांस्टेबल कमलेश कुमारी यादव को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया। वह यह सम्मान पाने वाली सीआरपीएफ की पहली महिला आरक्षक बनीं। आज उनके नाम पर सीआरपीएफ मुख्यालय में एक ब्लॉक है। उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि देश की रक्षा का फ़र्ज़ निभाने के लिए पद नहीं, बल्कि साहस मायने रखता है। उनके पति और बच्चे आज उनकी वीरता पर गर्व करते हैं, यह जानते हुए कि वह संसद की रक्षा थीं

कौन थीं कमलेश कुमारी?
कांस्टेबल कमलेश कुमारी का जन्म किसी महानगरीय पृष्ठभूमि में नहीं हुआ था, बल्कि उनका संबंध बिहार के समस्तीपुर जिले के महुआ बघानी गांव से था।

  • प्रारंभिक जीवन और विवाह: गांव का जीवन सरल और संघर्षपूर्ण था। उनकी शादी कम उम्र में राज किशोर से हुई और वह जल्दी ही मां बन गईं।
  • सेना में भर्ती: उन्होंने किसी साहसिक सपने से नहीं, बल्कि अपने परिवार के पालन-पोषण और जीवन को आर्थिक स्थिरता देने के उद्देश्य से 1994 में सीआरपीएफ में भर्ती होने का फैसला लिया।
  • कर्तव्य और गर्व: दिल्ली में तैनात होने के कारण, वह अपने बच्चों से मीलों दूर रहती थीं, लेकिन उनके पति के शब्दों में, उन्हें हमेशा अपने आराम से ज्यादा अपनी वर्दी और कर्तव्य पर गर्व था। वह अपने बच्चों के लिए गर्व का प्रतीक बनना चाहती थीं।

संसद हमलावर और षड्यंत्रकारी: किसका क्या हुआ?
13 दिसंबर 2001 को संसद भवन पर हमला करने वाले पांचों आतंकवादी सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में मौके पर ही मार गिराए गए थे। ये सभी पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से जुड़े थे। हालांकि, इस हमले की साज़िश रचने वाले मुख्य आरोपी मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु को लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद दोषी ठहराया गया और अंततः 9 फरवरी 2013 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई।

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