बेटे की इच्छामृत्यु के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे माता-पिता, याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब
Supreme Court News: 2013 से जिंदा लाश बनकर जी रहे एक 30 वर्षीय युवक के माता-पिता अपने बेटे की इच्छामृत्यु के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने से इनकार करने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की, जिस पर कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है।
दरअसल, चंडीगढ़ यूनिवसर्टी से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई कर रहे हरीश एक ऐसे ऐसा हादसे का शिकार बन गए, जिससे उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। साल 2013 में हरिश फोर्थ फ्लोर से गिर गए थे, जिसके वजह से उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। जिसके बाद से अब तक यानी 11 साल से हरीश बिस्तर पर है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने किया इनकार
हरीश के माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में बेटे की निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई, लेकिन कोर्ट ने इस याचिका को ठुकरा दिया। जिसके बाद अब माता-पिता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां मामले को "बहुत कठिन" बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र से जवाब मांगा।
कोर्ट तलाश रहा अन्य विकल्प
30 वर्षीय हरीश 2013 से अस्पताल में वानस्पतिक अवस्था में पड़ा हुआ है। वनस्पति अवस्था उसे कहते हैं, जब व्यक्ति जाग रहा होता है, लेकिन जागरूकता के कोई लक्षण नहीं दिखाता। इस मामले पर कोर्ट ने कहा कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने के बजाय, जो इस मामले में स्वीकार्य नहीं है, वह मरीज को इलाज और देखभाल के लिए सरकारी अस्पताल या इसी तरह के किसी स्थान पर ले जाने की संभावना तलाशेगा।
कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निष्कर्षों से सहमति जताई, जिसने माता-पिता की इस याचिका पर विचार करने के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने से इनकार कर दिया था कि उनके बेटे को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए। निष्क्रिय इच्छामृत्यु एक ऐसा जानबूझकर किया गया कार्य है, जिसमें मरीज को जीवन बचाने के लिए आवश्यक जीवन समर्थन या उपचार रोककर या वापस लेकर मरने दिया जाता है।
इच्छामृत्यु का कोई मामला नहीं बनता-कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि मरीज हरीश राणा जीवन को बनाए रखने के लिए वेंटिलेटर या अन्य यांत्रिक सहायता पर नहीं है, बल्कि उसे भोजन नली के माध्यम से भोजन दिया जा रहा है और इसलिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु का कोई मामला नहीं बनता।
अदालत इस तथ्य पर विचार कर रही थी कि एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के बाद से वह व्यक्ति 11 साल से वानस्पतिक अवस्था में है और उसके बूढ़े माता-पिता को इलाज के जरिए जीवन को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है क्योंकि उन्होंने अपना घर भी बेच दिया है।
पीठ का मानना था कि माता-पिता की यह दलील कि हरीश के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर विचार करने के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए, हाईकोर्ट द्वारा सही तरीके से खारिज कर दी गई थी, क्योंकि कोई भी मेडिकल पेशेवर किसी ऐसे मरीज को कोई पदार्थ इंजेक्ट करके मौत का कारण नहीं बनेगा, जो बिना किसी यांत्रिक या वेंटिलेटर सहायता के जीवित है।
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