Pandit Bhimsen Joshi : सुरों की साधना के लिए 11 साल में घर छोड़ा, निधन से पहले मिला 'भारत रत्न' सम्मान
भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी कला जगत में ऐसी किवदंती हैं जिन्होंने कला की अभूतपूर्व साधना की। साधना ऐसी जिसे कालातीत कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं। जानिए इनसे जुड़ी प्रेरक बातें-

भारत रत्न Pandit Bhimsen Joshi उस विभूति का नाम है जिन्होंने 11 साल की आयु में घर छोड़ने का फैसला सही साबित कर दिखाया। सुरों की साधना करने वाले पंडित जोशी ने खुद को कला के प्रति कुछ इस प्रकार समर्पित कर दिया कि देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत हुए। जोशी की लाइफ कला जगत के अलावा पूरी इंसानियत के लिए प्रेरक है। जानिए रोचक बातें- (सभी फोटो साभार- सोशल मीडिया)

100 साल पहले जन्मी अद्वितीय विभूति
Pandit Bhimsen Joshi ऐसी किवदंती हैं, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक के रूप में खास पहचान बनाई। भारत के महानतम सुरों के साधकों में एक, पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को धारवाड़ (कर्नाटक) में हुआ था। जोशी 24 जनवरी 2011 को पुणे में चिरनिद्रा में सो गए।

बचपन में सुरों की साधना में खो जाते थे
पंडित भीमसेन जोशी के पिता गुरुराज जोशी एक शिक्षक थे। दादा भीमाचार्य संगीतकार थे। बचपन में भीमसेन को अपनी माता के भजन सुनना बहुत अच्छा लगता था। पड़ोस की मस्जिद से सुबह की अजान और मंदिरों का भजन उन्हें आकर्षित करता था। घर के पास से गुजरने वाले संगीत मंडली को फॉलो करते-करते वे अक्सर अपना रास्ता भटक जाते थे।

11 साल की आयु में संगीत के लिए छोड़ा घर
11 साल की उम्र में संगीत की दुनिया में करियर बनाने के लिए घर से भागे भीमसेन जोशी के बारे में कुछ लोग बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्होंने ट्रेनों में बिना टिकट यात्रा की। भोजन के लिए यात्रियों को गाने सुनाए। किसी तरह ग्वालियर पहुंचने में कामयाब रहे। संगीत विद्यालय में कमाल के शास्त्रीय संगीत सुनने के बाद वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध केंद्र लखनऊ और रामपुर भी पहुंचे।

भीमसेन जोशी सवाई गंधर्व के शिष्य बने
घर छोड़ने के तीन साल बाद 1936 में, भीमसेन जोशी महान साधक सवाई गंधर्व के शिष्य बन गए। चार साल तक 14 साल के भीमसेन जोशी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारीक पहलुओं की शिक्षा हासिल की।

1941 में पहली परफॉर्मेंस
भीमसेन जोशी ने अपने गुरु को श्रद्धांजलि के रूप में पुणे में सवाई गंधर्व संगीत समारोह की शुरुआत की। पंडित जोशी ने अपना पहला परफॉर्मेंस 1941 में दिया था। उनकी संगीत शैली पर कई घरानों का प्रभाव था, लेकिन प्रतिभा अद्वितीय। दी इकोनॉमिस्ट ने पंडित जोशी के निधन के बाद लिखा था, भीमसेन जोशी हिन्दुस्तानी संगीत की अपने ढंग से व्याख्या करते थे।

गुरुदेव को शिष्य भीमसेन जोशी की श्रद्धांजलि
साल 2002 तक भीमसेन जोशी ने स्वयं सवाई गंधर्व संगीत समारोह आयोजित की। हिंदुस्तानी संगीत कैलेंडर की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक साल 2008 में हुई।

15 साल पहले मिला 'भारत रत्न'
शास्त्रीय कंपोजिशन- 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली ऐसी प्रस्तुति है जिससे भीमसेन जोशी घर-घर में पहचाने गए। आज से 15 साल पहले उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान- भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

प्रतिभाएं अमर हैं, पंडित जोशी बिना परछाईं के शरीर !
24 जनवरी 2011 को पंडित भीमसेन जोशी चिरनिद्रा में सो गए, लेकिन उनकी स्मृति में कही गई सबसे खूबसूरत बात गायक अश्विनी भिडे ने कहा, "प्रतिभाएं अमर हैं, लेकिन दुख की बात है कि शरीर अमर नहीं होते। पंडित भीमसेन जोशी के निधन से ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कोई शरीर बिना साये के बिना चल रहा हो।"












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