पाकिस्तान: क़र्ज़ मांगते घूम रहे पीएम शहबाज़ शरीफ़, क्या इससे सुधरेंगे हालात?

पाकिस्तानी व्यक्ति
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पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कई देशों से क़र्ज़ और आर्थिक राहत हासिल करने में कामयाबी हासिल की है.

पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है. पाकिस्तान के सेंट्रल बैंक ने गुरुवार को बताया कि पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 4.3 अरब डॉलर रह गया है. विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के पास सिर्फ़ 3-4 सप्ताह के आयात का ही फंड बचा है.

पाकिस्तान में साल 2022 में बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई. बाढ़ के असर से 1700 से अधिक लोग मारे गए और 3.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए. पाकिस्तान को इस बाढ़ से 30 अरब डॉलर का आर्थिक नुक़सान भी हुआ.

लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के विश्वास मत हारने के बाद पद छोड़ने से पाकिस्तान में गंभीर राजनीतिक संकट भी पैदा हुआ है. उधर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान सिर उठा रहा है और जगह-जगह हमले कर रहा है.

एक तरह से देखा जाए तो इस समय पाकिस्तान गंभीर आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संकट में फंसा हुआ है.

पाकिस्तान में आर्थिक हालात इतने खराब हो गए हैं कि सरकार को बाज़ारों और मॉल को समय से पहले बंद करने का आदेश देना पड़ा है. सरकारी कार्यालयों और विभागों को भी बिजली खपत 30 प्रतिशत कम करने का आदेश दिया गया है. बिजली ख़र्च बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है. पाकिस्तान अपनी अधिकतर ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है.

पाकिस्तान को अगले दो साल तक प्रति वर्ष 20 अरब डॉलर का क़र्ज़ भी चुकाना है. साल 2017 में पाकिस्तान पर सालाना क़र्ज़ सात अरब डॉलर का था. अब ये देनदारी बढ़कर 20 अरब डॉलर प्रति वर्ष हो गई है.

22 करोड़ की आबादी का देश पाकिस्तान लगातार क़र्ज़ में फंसता जा रहा है. साल 2019 में पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) से छह अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज हासिल किया था. वहीं पिछले साल अगस्त में भी आईएमएफ़ ने पाकिस्तान को 1.1 अरब डॉलर का क़र्ज़ दिया था.

2022 में पाकिस्तान में बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई जिससे अर्थव्यवस्था चरमरा गई
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2022 में पाकिस्तान में बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई जिससे अर्थव्यवस्था चरमरा गई

मदद जुटाने की कोशिश

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और नए सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने मित्र राष्ट्रों का दौरा किया है और पाकिस्तान के लिए फंड और क़र्ज़ जुटाने की कोशिशें की हैं.

शहबाज़ शरीफ़ गुरुवार को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दौरे पर थे. संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान के लिए एक अरब डॉलर के नए क़र्ज़ की घोषणा की है. साथ ही यूएई ने पहले से दिए हुए दो अरब डॉलर के क़र्ज़ को भी आगे बढ़ा दिया है.

शहबाज़ शरीफ़ ने अबु धाबी में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान से मुलाक़ात की और उनका शुक्रिया अदा किया.

कुछ दिन पहले ही सऊदी अरब ने भी पाकिस्तान के लिए नए क़र्ज़ की घोषणा की थी. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में निवेश में मदद करने के तरीके तलाशने का आदेश भी दिया है.

सऊदी प्रेस एजेंसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी फंड फॉर डेवलपमेंट, पाकिस्तान के सेंट्रल बैंक में अपनी जमा पूंजी को तीन अरब डॉलर से बढ़ाकर पांच अरब डॉलर करने के लिए शोध करेगा.

वहीं ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब पाकिस्तान में अपने निवेश को दस अरब डॉलर तक बढ़ाएगा.

इसी साल दिसंबर में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को चार प्रतिशत की ब्याज़ दर पर तीन अरब डॉलर का एक और लोन भी दिया था.

हाल ही में जेनेवा में हुए सम्मेलन में भी विश्व के बड़े आर्थिक संस्थानों और विकसित देशों ने पाकिस्तान के लिए लगभग दस अरब डॉलर के बाढ़ राहत फंड की घोषणा की है.

पाकिस्तानी मुद्रा
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क्यों परेशान है पाकिस्तान?

पाकिस्तान और दुनिया के अन्य विकासशील देशों के सामने बैलेंस ऑफ़ पेमेंट (भुगतान देय) का संकट है. विकासशील देशों के निर्यात की क़ीमतें इतनी नहीं बढ़ीं जितनी की आयात की बढ़ गईं.

उदाहरण के तौर पर कच्चे तेल की क़ीमत 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, अधिकतर विकासशील देश एलएनजी (तरल प्राकृतिक गैस) का आयात करते हैं, वो महंगी हो गई है. कोयला महंगा हो गया, खाना बनाने का तेल भी महंगा हो गया.

लेकिन पाकिस्तान जैसे विकासशील देश जिन चीज़ों का निर्यात करते हैं उसकी क़ीमतें इतनी नहीं बढ़ीं. इसलिए ऐसे देशों के सामने बैलेंस ऑफ़ पेमेंट का संकट खड़ा हो गया. पाकिस्तान, घाना, अर्जेंटीना, श्रीलंका, ग्रीस और ज़ांबिया जैसे देश इस समस्या का सामना कर रहे हैं.

विश्लेषक मानते हैं कि इससे बैलेंस ऑफ़ पेमेंट का संकट पैदा हुआ है जो आर्थिक चुनौतियों की जड़ है.

पाकिस्तान के वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक फारूख़ सलीम पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं को समझाते हुए कहते हैं, "पाकिस्तान ख़ासतौर पर बैलेंस ऑफ़ पेमेंट के संगीन संकट से जूझ रहा है. पाकिस्तान के आयात और निर्यात में 40 अरब डॉलर से अधिक का फ़ासला आ गया. इसके अलावा पाकिस्तान के लोगों को महंगाई का भी सामना करना पड़ रहा है. कई जगह महंगाई 25 फ़ीसदी से भी अधिक हो गई है. पाकिस्तान के पास उपलब्ध डॉलर लगभग ख़त्म होते नज़र आ रहे हैं. पाकिस्तान के पास क़रीब तीन या चार हफ़्ते की ख़रीदारी का ही फंड है. पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार इस समय 4.3 अरब डॉलर है जो साल 2014 के बाद से सबसे कम स्तर पर है."

पाकिस्तान के सामने आपात स्थिति है और इसलिए ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ऐसे देशों के दौरे पर गए हैं जिनसे पाकिस्तान के दोस्ताना संबंध हैं. वो पाकिस्तान के लिए फंड जुटाने की कोशिशें कर रहे हैं. इसके अलावा उन्होंने पुराने क़र्ज को आगे बढ़ाया है.

फ़ारूख़ सलीम कहते हैं, "एक अच्छी ख़बर पाकिस्तान के लिए जेनेवा से आई है. दुनिया के बड़े आर्थिक संस्थानों और देशों ने पाकिस्तान के लिए दस अरब डॉलर से अधिक के वादे किए हैं. ये पैसा पाकिस्तान में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के कामों पर ख़र्च होना है. ये फंड पाकिस्तान की उम्मीद से कहीं ज़्यादा है. पाकिस्तान ने आठ अरब डॉलर का टार्गेट रखा था, लेकिन इससे कहीं अधिक के वादे हुए हैं."

क्या क़र्ज़ है समाधान?

लेकिन सवाल ये है कि क्या ये नए क़र्ज़ या वादे पाकिस्तान को मौजूदा आर्थिक संकट में राहत दे सकते हैं?

फ़ारूख़ सलीम कहते हैं, " ये वादे पाकिस्तान की मौजूदा जरूरतों को सीधे तौर पर पूरा नहीं करेंगे. ये वादे जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए किए गए हैं ऐसे में इन फंड का इस्तमाल पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट पर ही हो सकेगा. संयुक्त अरब अमीरात या सऊदी अरब से पाकिस्तान को जो क़र्ज़ मिल रहा है वो पाकिस्तान की आर्थिक बीमारी का इलाज नहीं है बल्कि उसके लक्षणों को दबाने की कोशिश भर हैं. ये क़र्ज़ बीमारी का इलाज नहीं हैं."

हालांकि ये नए क़र्ज मौजूदा स्थिति में पाकिस्तान को फ़ौरी राहत ज़रूर देंगे.

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आर्थिक सुधार की चुनौती

फ़ारूख़ सलीम कहते हैं, "पाकिस्तान को एक दिन ये क़र्ज़ चुकाना ही होगा. अभी पाकिस्तान के सामने करंसी का संकट है और उसे अल्पकालिक हल चाहिए, ऐसे में ये क़र्ज़ मददगार साबित होंगे. कम समय में कोई सुधार नहीं किया जा सकता है, ऐसे में ये क़र्ज़ फौरी राहत हैं."!

पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक सुधारों की है. विश्लेषक मानते हैं कि नए क़र्ज़ से फ़ौरी राहत तो मिल सकती है लेकिन संकट का समाधान नहीं होगा.

फ़ारूख़ सलीम कहते हैं, "जहां तक अर्थव्यवस्था में सुधार का सवाल है तो वो क़र्ज़ से नहीं होगा. सुधार एड (बाहरी मदद) से नहीं बल्कि ट्रेड (कारोबार) से होगा. ना ही आयात पर नियंत्रण करके सुधार किया जा सकता है बल्कि इसके लिए निर्यात को बढ़ावा देना होगा."

पिछले साल श्रीलंका में गंभीर आर्थिक संकट पैदा हुआ था जिसके बाद राजनीतिक हालात भी प्रभावित हुए. लोग सड़कों पर उतर आए और राष्ट्रपति को देश छोड़कर जाना पड़ा.

लेकिन पाकिस्तान में भले ही आर्थिक संकट श्रीलंका जैसा हो लेकिन इसके अभी राजनीतिक असर दिखाई नहीं दे रहे हैं.

फ़ारूख़ सलीम कहते हैं, "पाकिस्तान के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट बैलेंस ऑफ़ पेमेंट का है. श्रीलंका में भी आर्थिक संकट इसी वजह से पैदा हुआ था. पाकिस्तान के आर्थिक संकट के भी लक्षण ऐसे ही हैं जैसे श्रीलंका के थे. लेकिन श्रीलंका पाकिस्तान की तुलना में बहुत छोटा देश है. पाकिस्तान का भू-राजनैतिक महत्व भी श्रीलंका के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है."

वो कहते हैं, " श्रीलंका का संकट बैलेंस पेमेंट से शुरू हुआ, फिर करंसी का संकट पैदा हुआ और फिर उसके नतीजे में महंगाई बेतहाशा बढ़ी और फिर चीज़ों की क़िल्लत होने लगी. ऐसे सभी देश जो ज़रूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं इस संकट को झेल रहे हैं. महंगाई और बैलेंस आफ पेमेंट का संकट पाकिस्तान में भी है हालांकि जिस तरह श्रीलंका में राजनीतिक विरोध हुआ और प्रदर्शन हुए, वैसा कोई संकेत पाकिस्तान में अभी नज़र नहीं आ रहा है."

पाकिस्तान आटा
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पाकिस्तान आटा

भारत से क्यों पिछड़ गया पाकिस्तान?

साल 1947 से लेकर 1991-92 तक भारत की विकास दर पाकिस्तान के मुक़ाबले आधी रहती थी. लेकिन 1991 में भारत में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के किए गए आर्थिक सुधारों के बाद भारत विकास की रफ़्तार में पाकिस्तान से बहुत आगे निकल गया. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक पाकिस्तान की विकास दर के दो प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान ज़ाहिर किया गया है वहीं भारत की विकास दर 2021 में 8.7 प्रतिशत थी.

पाकिस्तान के भारत से पिछ़़ड़ने की वजह बताते हुए फ़ारूख़ सलीम कहते हैं, "पाकिस्तान राष्ट्र पर सबसे बड़ा बोझ पाकिस्तान सरकार ख़ुद है. सरकार के स्वामित्व वाले जो उद्यम हैं, वो नुक़सान में है. पाकिस्तान सरकार 195 उद्यम चलाती है. इनमें पाकिस्तान स्टील है, पीआईए है, पाकिस्तान रेलवे है. इन पर भारी ख़र्च होता है. लगभग 1800 अरब रुपए का इनमें नुकसान होता है. पाकिस्तान सरकारी एंटरप्राइज़ को सरकार के नियंत्रण से मुक्त नहीं कर पाया."

सलीम कहते हैं, "वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान अपनी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाया है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान मे लगभग 1500-1600 मेगावॉट बिजली सौर ऊर्जा से बनती है जबकि उसके पास क्षमता 30 लाख मेगावॉट की है. पवन उर्जा की भी यही हालत है. पाकिस्तान के पास क्षमता लगभग साढ़े तीन लाख मेगावॉट की है लेकिन अभी वो उत्पादन सिर्फ 1400 मेगावॉट के आसपास ही कर रहा है. पाकिस्तान में संसाधनों, प्रतिभा या किसी और चीज़ की कमी नहीं है. लेकिन वो अपनी क्षमताओं का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है."

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