फिर दुहराया 1990 का खौफ: पहलगाम अकेला नहीं, लगातार सुनियोजित हिंसा के शिकार हो रहे हिंदु फिर भी चुप दुनियां
Pahalgam Attack: 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए निर्मम आतंकी हमले ने एक बार फिर उस कट्टरपंथी मानसिकता की याद दिला दी जिसने तीन दशक पहले कश्मीर घाटी को हिंसा की आग में झोंक दिया था। द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF), जो लश्कर-ए-तैयबा का ही एक प्रॉक्सी संगठन है, ने इस हमले में 26 निर्दोष पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी। यह महज़ एक आतंकी घटना नहीं थी, यह भारत की बहुलतावादी आत्मा पर एक सुनियोजित हमला था। लोगों का धर्म पूछकर, कलिमा पढवाकर और वस्त्र हटाकर हमला किया गया। मतलब इस हमले का भी मकसद वही था, जो 1990 के कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और वृहत्तर पलायन के पीछे था।

1990 की गूंज: जब घाटी से पंडितों को चुन-चुनकर निकाला गया
इस हमले की भयावहता 1990 के उस दौर की पुनरावृत्ति जैसी है, जब घाटी में "रलिब, गलिब, चलिब का नारा गूंजा करता था जिसने अंततः कश्मीरी पंडितों को धर्मांतरण, पलायन या मृत्यु का विकल्प दिया था। लाउडस्पीकरों से धमकियां दी गईं, मंदिरों को अपवित्र किया गया, और सैकड़ों परिवारों को रातों-रात अपना घर छोड़ना पड़ा। आंकड़ों के अनुसार, 1990 तक लगभग एक लाख कश्मीरी पंडित पलायन कर चुके थे जबकि दर्जनों की हत्या कर दी गई थी। इस बार जब पर्यटकों को केवल भारतीय होने की कीमत चुकानी पड़ रही है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है-क्या वाकई कुछ बदला है?
परिवर्तन आया है, लेकिन संघर्ष अब भी जारी है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनुच्छेद 370 की समाप्ति एक ऐतिहासिक निर्णय था, जिसने दशकों से पल रहे अलगाववादी तत्वों को बड़ा झटका दिया। लेकिन पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन अब भी इस नई स्थिरता को चुनौती देने की कोशिश में लगे हैं। पहलगाम की यह घटना उनकी बौखलाहट का प्रमाण है-क्योंकि वे एक शांत और एकीकृत जम्मू-कश्मीर को स्वीकार नहीं कर पा रहे। अगर परिवर्त्तन की बात करें तो 40 सालों में पहली बार कश्मीर के लोगों ने आतंकी हमले के खिलाफ आवाज़ उठाई है लेकिन आतंक की समाप्ति के लिए अभी लंबा रास्ता तय करने की जरूरत है।
सिर्फ भारत नहीं-पूरे दक्षिण एशिया में हिंदू बनते हैं निशाना
विचारधारा या धर्म आधारित हत्या का यह पैटर्न भारत तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ निरंतर अत्याचार हो रहे हैं। इनमें संस्थागत और सुनियोजित अत्याचार भी शामिल है।
- बांग्लादेश में 1951 में जहां हिंदुओं की जनसंख्या 22% थी, वहीं आज यह घटकर 8% से भी कम रह गई है। इस छोटे से देश में महज 2024 में ही 76 बड़े हमले दर्ज किए गए, जिनमें मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया, घर जलाए गए और महिलाओं पर हमले हुए।
- पाकिस्तान में स्थिति और भी चिंताजनक है। ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग, मंदिरों का विध्वंस, और नाबालिग हिंदू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। पाकिस्तान में अकेले 2024 के पहले 10 महीनों में 100 से अधिक घटनाएं दर्ज हुईं।
दुखद यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अक्सर इस हिंसा को नजरअंदाज करता है। जब दुनिया के अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात होती है तो हिंदुओं की पीड़ा क्यों उपेक्षित रह जाती है? हलांकि इस प्रश्न का उत्तर अब उतना कठिन नहीं रह गया है। हाल के दिनों में जो मामूली बदलाव देखने को मिल रहा है वो एक हद तक कहें तो केंद्र की मोदी सरकार के कारण है जिसकी आतंकवाद को लेकर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति रही है। जहां विपक्ष अक्सर तुष्टीकरण की राजनीति में उलझा रहता है, वहीं भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखा है।
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र द्वारा आतंकवाद उन्मूलन और कश्मीर में शांति और समरसता के लिए गंभीर प्रयास किए गए हैं। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण कदमों पर नज़र डालते हैं:
- अनुच्छेद 370 का उन्मूलन,
- सीमापार आतंक पर जवाबी कार्रवाई,
- और कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की दिशा में ठोस पहल-इन सभी प्रयासों ने यह सिद्ध किया है कि मोदी सरकार केवल बयान नहीं देती, कार्रवाई करती है।
पहलगाम की त्रासदी इस बात की सशक्त याद दिलाती है कि आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए मज़बूत और निर्णायक नेतृत्व आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। यह समय है सच्चाई को स्वीकारने का, और उस एकजुट भारत के लिए खड़े होने का, जिसे आतंक की कोई भी ताकत तोड़ नहीं सकती।












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