मेमन को फांसी, चुप्पी सादी सियासी दलों ने
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) याकूब मेमन की फाँसी पर राजनीतिक दलों ने चुप साध ली। कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा सब चुप हैं। पर एमआईएम के नेता ओवैसी उछल रहे हैं वही शायद इसे राजनीतिक मुद्दा बनाएंगे। एक तरह से यह फाँसी ओवैसी के लिए यूपी में राजनीतिक भूमि तैयार करेगी।
यूपी में ओवैसी
वरिष्ठ लेखक शंभूनाथ शुक्ल मानते हैं कि अब देखना यह है कि ओवैसी की यूपी में मेहमाननवाजी कौन करेगा। औवैसी का यूपी प्रवेश मुसलमानों के लिए हितकर तो नहीं होगा अलबत्ता यूपी में राजनीतिक ध्रुवीकरण और तेज होगा तथा अपेक्षाकृत एक शरीफ मुस्लिम पार्टी डॉक्टर अय्यूब की पीस पार्टी अब समाप्त हो जाएगी।
इस बीच, वरिष्ठ लेखक ओमकार चौधरी कहते हैं कि अगर मेमन को फांसी होनी ही थी तो प्रशांत भूषण और दूसरे कुछ वकील देर रात मुख्य न्यायाधीश से यह अपील करने क्यों पहुँच गए कि चौदह दिन के लिए इसे टाल दें क्योंकि दया याचिका ख़ारिज होने के बाद 14 दिन का अंतराल नियमानुसार दिया जाना चाहिए।
क्या थी याकूब मेमन की आखिरी ख्वाहिश, कैसे हुई पूरी
इस मामले में भला और कितना वक्त लिया जाएगा। दो दो बार याकूब मेनन की तरफ से राष्ट्रपति और राज्यपाल के यहाँ दया याचिका लगाई जा चुकी हैं। अगर इस बीच उसने तीसरी याचिका लगा दी तो क्या फिर 14 दिन के लिए फाँसी रोकने की अपील होती रहेंगी।
न्यायिक प्रकिया से मजाक
वे कहते हैं ये न्यायिक प्रक्रिया और सहूलियतों का अनुचित दुरूपयोग हो रहा है। न ये न्यायिक प्रक्रिया के लिए सही है और न देश के हित में। जितनी देरी होगी उतनी समाज में भी कसीद्गी बढ़ने की आशंका पैदा होगी। बुधवार को पूरे दिन सुप्रीम कोर्ट में इसी पर सुनवाई होती रही।
उसकी दोनों याचिकाएं ख़ारिज हुई। राष्ट्रपति ने भी दूसरी याचिका ख़ारिज कर दी। नागपुर में उसे फांसी की सारी तैयारियां हो चुकी थी। पूरा देश एक तरह से होल्ड पर है। ऐसे में रात को दो बजे फिर से सुनवाई भारत में ही मुमकिन है। ताज्जुब की बात है कि हमारे यहाँ आतंकवादियों के मानवाधिकारों की बड़ी चिंता होती है। जो बम धमाकों के शिकार होते हैं उनकी इतनी चिंता नहीं की जाती।













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