नज़रिया: राज्यसभा के उपसभापति चुनाव की बिसात पर एनडीए की बाज़ी पलट पाएगी कांग्रेस?

नरेंद्र मोदी और अन्य मंत्री
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नरेंद्र मोदी और अन्य मंत्री

गुरुवार को संसद में एक बार फिर एनडीए और कांग्रेस आमने-सामने होंगे. राज्यसभा के उप-सभापति के लिए एनडीए ने जहां जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. वहीं, कांग्रेस की ओर से बीके हरिप्रसाद उम्मीदवार होंगे.

राज्यसभा में इस समय सदस्यों की कुल संख्या 244 है और किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए 123 सदस्यों का समर्थन चाहिए होगा. बीजेपी के उच्च सदन में 73 सदस्य हैं जबकि जेडीयू के छह, अकाली दल और शिवसेना के तीन-तीन सदस्य हैं.

वहीं, कांग्रेस के पास 50 सांसद हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह बेशक जीतने की ओर बढ़ रहे हैं क्योंकि टीआरएस ने एनडीए को पहले ही समर्थन देने की बात कह दी थी.

वहीं, बुधवार को जब बीजेडी, अकाली दल और शिवसेना ने भी एनडीए के उम्मीदवार को समर्थन देने के संकेत दिए उससे साफ़ हो गया कि जीत की ओर कौन जा रहा है. हालाँकि सदन में क्या होगा इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है.

ऐसा लग रहा है कि राज्यसभा के उप-सभापति का चुनाव केवल टोकन फ़ाइट है क्योंकि कांग्रेस अगर अपने राज्यसभा सांसद बीके हरिप्रसाद की जगह एनसीपी की वंदना चव्हाण को उम्मीदवार बनाती तो शिवसेना भी उन्हें वोट दे सकती थी.

2007 के राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने ऐसा ही किया था और मराठी अस्मिता के नाम पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को वोट किया था.

शिवसेना ने अगर अलग रुख़ अपनाया होता तो एनडीए के लिए मुश्किल आती लेकिन अब रास्ता साफ़ हो गया है.

क्या कांग्रेस को जीत दिला पाएंगे हरिप्रसाद

कांग्रेस ने बीके हरिप्रसाद को चुना है जो अच्छे सांसद हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनका अन्य दलों में अच्छा नेटवर्क है जिससे वह समर्थन ले सकें.

हरिप्रसाद को भी अगर अलग रख दिया जाए तो कांग्रेस की ओर से भी इस पूरे चुनाव को लेकर कोई तेज़ी नहीं दिखाई दी. कांग्रेस ने न बीजेडी से बात की और न ही टीआरएस से और अब देखना यह है कि जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस किस ओर जाती है.

वाईएसआर कांग्रेस ने कह दिया है कि वह एनडीए के उम्मीदवार को वोट नहीं देगी, लेकिन मुझे लगता है कि वह अनुपस्थित भी रह सकती है.

वहीं, टीएमसी किसी भी हाल में एनडीए को वोट नहीं करेगी. बीजेडी की बात करें तो पिछले दिनों लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान वह सदन से अनुपस्थित रही और उन्होंने कभी नहीं कहा कि वह कांग्रेस की ओर जाएंगे.

इतना ज़रूर है कि बीजेडी बीजेपी को ओडिशा में ख़ुद के लिए ज़रूर चुनौती मानती है. इसका मतलब यह नहीं है कि वह इससे डरकर कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ेगी.



विपक्ष एकजुटता दिखा पाया?

विपक्षी एकजुटता की अगर बात की जाए तो यह एक अच्छा मौका था. कांग्रेस सबको एकसाथ लाकर अपनी ताक़त दिखा सकती थी लेकिन, मुझे लगता है कि कांग्रेस ने अपने हाथ से यह मौका खो दिया है.

कांग्रेस की ओर से कोई कोशिश नहीं दिखाई दी कि वह किसी ग़ैर-कांग्रेसी या ग़ैर-भाजपाई दल से बात करे. शिवसेना बीजेपी से बेहद नाराज़ चल रही है, कांग्रेस उनसे भी बात नहीं कर पाई.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा राज्यसभा में पार्टी के पास आनंद शर्मा, ग़ुलाम नबी आज़ाद, पी. चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे कद्दावर नेता थे लेकिन तब भी कांग्रेस हमलावर रूप में नहीं थी.

ऐसा लगता है कि इस पूरे चुनाव को लड़ने में कांग्रेस की इच्छा ही नहीं थी क्योंकि अगर होती तो एक राय बनाकर किसी उम्मीदवार को चुना जाता.

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