One Nation, One Election: एक देश-एक चुनाव को लेकर उठ रहे हैं ये 5 बड़े सवाल, जानिए उनके जवाब?
One Nation, One Election FAQ: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, नगर पालिकाओं और साथ ही पंचायतों के लिए एक साथ चुनाव कराने के लिए 'वन नेशन-वन इलेक्शन' को लेकर कमेटी गठित कर दी है। एक देश-एक चुनाव कराना, कैसे संभंव है, उसके लिए क्या करना होगा...इस पर विचार-विमर्श करने और उसकी व्यवहार्यता की जांच करने और उसी के लिए सिफारिशें करने के लिए 8 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है।
इस 8 सदस्यीय कमेटी की अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद करेंगे। इस पैनल के बनने के बाद कई लोगों के मन में कई सारे सवाल हैं। यहां आपको पैनल, उसकी भूमिका और एक साथ चुनाव के पीछे के विचार को लेकर उठने वाले सारे सवालों के जवाब बता रहे हैं।

1. क्या है एक देश-एक चुनाव?
- भारत में "एक देश, एक चुनाव" की अवधारणा का उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनावों को सिंक्रनाइज करना है। यानी देश में होने वाले लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होगा। इन चुनावों को एक साथ, एक ही दिन या एक निश्चित समय सीमा के भीतर कराने का विचार है।
2. 'एक राष्ट्र एक चुनाव' के क्या हैं फायदे?
- एक राष्ट्र, एक चुनाव' का प्राथमिक लाभ चुनाव कराने की लागत में कमी है क्योंकि अलग-अलग चुनाव के लिए भारी मात्रा में वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है।
- एक साथ चुनाव होने से प्रशासनिक और सुरक्षा बलों पर बोझ कम होगा।
-'एक राष्ट्र, एक चुनाव' कराने स सरकार चुनावी मोड में रहने के बजाय शासन पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकती है।
-विधि आयोग के मुताबिक एक साथ चुनाव से मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी क्योंकि लोगों के लिए एक साथ कई मतपत्र डालना ज्यादा आसान होगा।
-इसके पक्ष में लोगों का कहना है कि एक साथ चुनाव कराने से समय और पैसा बचाने में मदद मिल सकती है और सरकारों को चुनाव जीतने की चिंता करने के बजाय शासन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए 5 स्थिर वर्ष मिल सकते हैं।
3. 'एक राष्ट्र एक चुनाव' लागू करने में क्या दिक्कतें होगीं?
-'एक राष्ट्र, एक चुनाव' को लागू करने के लिए संविधान और अन्य कानूनी ढांचे में भी बदलाव की जरूरत हो सकती है।
- एक राष्ट्र-एक चुनाव के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी और फिर इसे राज्य विधानसभाओं में भी ले जाना होगा।
- 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का विरोध करने वालों का कहना है कि इस तरह का विचार संघवाद और क्षेत्रीय लोकतंत्र को कमजोर कर देगा। उनका कहना है कि इससे अंतत राष्ट्रीय पार्टियों को क्षेत्रीय पार्टियों की तुलना में अधिक लाभ मिलेगा। उनका यह भी कहना है कि ऐसा अभ्यास महंगा और तार्किक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा।
-इसके अलावा चिंता यह भी है कि क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों पर भारी पड़ सकते हैं, जिससे राज्य स्तर पर चुनावी नतीजे प्रभावित हो सकते हैं।
-इसमें सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति एक बड़ी बाधा है साथ ही विपक्षी दलों ने 'एक राष्ट्र एक चुनाव' का विरोध किया है।
4. क्या 'एक राष्ट्र एक चुनाव' नई अवधारणा है?
- 'एक राष्ट्र एक चुनाव, यह कोई नई अवधारणा नहीं है। देश की आजादी के बाद 1950 और 60 के दशक में चार बार ऐसा हो चुका है, लेकिन उस वक्त भारत में कम राज्य थे और आबादी भी कम थी।
-टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1967 तक राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के लिए एक साथ चुनाव होते थे। हालांकि, 1968 और 1969 में और 1970 में लोकसभा के विघटन के बाद कुछ विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया गया था। इससे चुनावी बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ा।
5. क्या अन्य देश भी इसी तरह चुनाव कराते हैं?
अगर भारत किसी तरह एक साथ चुनाव लागू कर देता है तो वह ऐसी व्यवस्था वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। वर्तमान में, दक्षिण अफ्रीका, बेल्जियम और स्वीडन ही ऐसे देश हैं जो एक साथ चुनाव कराते हैं।
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