One Nation One Election: क्या 'एक राष्ट्र एक चुनाव' संघीय ढांचे को चुनौती है?
One Nation One Election Hindi: केंद्र सरकार 'वन नेशनल वन इलेक्शन' के विचार को हर हाल में लागू करवाना चाहती है। लेकिन, कई चीजें हैं, जिसको लेकर इस विचार की उतनी ही ज्यादा आलोचनाएं भी होती हैं। इनमें से सबसे बड़ी बात ये है कि इसके विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि 'वन नेशनल वन इलेक्शन' का विचार भारतीय संविधान के तहत स्थापित संघीय ढांचे की व्यवस्था के पूरी तरह खिलाफ है।
हालांकि, देश में आजादी के बाद जब चुनावों की शुरुआत हुई थी, तब देश में आमतौर पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ होने शुरू हुए थे। बाद में कई सारी राज्य सरकारें समय से पहले बर्खास्त की गईं और इसके चलते राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे और पूरी व्यवस्था ही धीरे-धीरे पटरी से उतर गई।

संघीय ढांचे के लिए चुनौती की बात कहां से आई?
बहरहाल, 'वन नेशनल वन इलेक्शन' को इस वजह से संघीय ढांचे के विरुद्ध बताया जाता है कि संविधान के अनुच्छेद-1 में भारत को 'राज्यों का संघ' बताया गया है। इसकी वजह से एक साथ चुनाव को राज्य सरकारों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर हमला बताया जाता है। आलोचकों का कहना है कि इस व्यवस्था से न सिर्फ देश का संघीय ढांचा कमजोर होगा, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच हितों का टकराव भी बढ़ेगा।
संविधान के 5 महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में बदलाव की जरूरत
'वन नेशनल वन इलेक्शन' की व्यवस्था को लागू करने के लिए कम से कम पांच संविधान संशोधन करने पड़ेंगे। ये हैं अनुच्छेद 83 (लोकसभा का कार्यकाल), अनुच्छेद 85 (राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा भंग करना), अनुच्छेद 172 (विधानसभाओं का कार्यकाल), अनुच्छेद 174 (विधानसभाओं को भंग करना) और अनुच्छेद 356 (राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करना)। आलोचकों का कहना है कि इतने सारे अनुच्छेदों को एक नहीं किया जा सकता और इसकी कोशिश संघीय ढांचे के खिलाफ होगी।
राज्यों के स्वतंत्र संवैधानिक अस्तित्व को खतरा?
यह व्यवस्था संघीय ढांचे के साथ खिलवाड़ होगा, इस तर्क के पीछे एक और बड़ा उदाहरण एसआर बोम्मई केस का दिया जाता है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के स्वतंत्र संवैधानिक अस्तित्व पर जोर दिया है।
मतदाताओं की प्राथमिकताओं पर प्रहार!
'एक राष्ट्र एक चुनाव' के खिलाफ यह भी तर्क दिया जाता है कि मतदाता देश, राज्य और पंचायती राज्य संस्थाओं के लिए अलग-अलग प्राथमिकताएं तय करते हैं और उसी के हिसाब से चुनाव प्रक्रिया में शामिल होते हैं। लेकिन, नई शुरुआत से यह व्यवस्था बिगड़ जाएगी, जो कि संविधान के संघीय ढांचे की व्यवस्था के लिए सही नहीं है।
इसलिए जरूरी है 'एक राष्ट्र एक चुनाव' की व्यवस्था को लागू करने से पहले इसपर राज्यों के साथ-साथ सभी स्टेक होल्डर्स को पूरी तरह से विश्वास में लिया जाए। इसके लिए 'सहकारी संघवाद' के विचार को आगे बढ़ाया जा सकता है, जो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं में रहा है।
राज्यों पर केंद्र का प्रभुत्व थोपने की कोशिश?
विरोधी विचार में यह भी कहा जाता है कि 'वन नेशनल वन इलेक्शन' दरअसल, केंद्र का प्रभुत्व थोपने की कोशिश है, जो कि संविधान निर्माताओं की सोच के विपरीत है। जहां तक 'वन नेशनल वन इलेक्शन' की आवश्यकता की बात है तो इसके पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि आम चुनावों और विधानसभा के चुनाव साथ करवाने से सरकार पर पड़ने वाले खर्च का भार अप्रत्याशित रूप से कम हो सकता है।
इसके पक्ष में दूसरा प्रमुख तर्क ये है कि यह व्यवस्था लागू होने से 5 साल में एक ही बार मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू होगा। इससे सरकारी कामों में दो-दो बार आने वाली अड़चनें समाप्त होंगी, इससे राष्ट्र निर्माण के कार्य में रुकावटें कम होगी और देश तेजी से प्रगति करेगा।
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लेकिन, विरोधियों का तर्क है कि लोग अपने पसंद की सरकार चुनें, इसके लिए कोई खर्च ज्यादा नहीं है। कई बार सरकारें पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले गिर जाती हैं। ऐसे में जनता को अपने मताधिकार से नई सरकार बनाने का मौका मिलता है, जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है।
इसी तरह से अगर साथ चुनाव होंगे तो राष्ट्रीय पार्टियों और क्षेत्रीय दलों को बराबर का मैदान नहीं मिल पाएगा, जो कि लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। लेकिन, अगर जरूरी चिंताओं का उचित समाधान निकल आता है तो यह व्यवस्था संघीय ढांचे के लिए चुनौती बनने से ज्यादा, उसे और मजबूत बनाने के काम आ सकता है।












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